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तीन दशक से जल रही अखंड ज्योत, आज भी प्रज्ज्वलित

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श्योपुर। जंगल में मंगल कर रही दुर्गापुरी वाली माता का इतिहास प्राचीन और चमत्कारों भरा है। बुजुर्गों की बातों और मंदिर से जुड़ी किवदंतियों पर यकीन करें तो दुर्गापुरी मंदिर का इतिहास पांडवकाल के समय का है। सबसे पहले माता के स्थान की खोज डांगवाले बाबा के नाम से प्रसिद्व स्व. शिवरानायण पाराशर ने करीब 90 साल पूर्व की थी। तब यहां पर एक पेड़ के नीचे माता की प्रतिमा विराजित की गई थी। इसकी प्रसिद्वि तब सामने आई जब राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने स्वयं मंदिर पर दर्शनार्थियों के लिए पीने के पानी बोर करवाने के साथ, भव्य मंदिर बनवाने के साथ अखंड ज्योत जलाई जो आज भी प्रज्ज्वलित है। दुर्गापुरी वाली माता को धन्य-धान्य करने व मनोकामना पूर्ण करने वाली माता के रूप में जाना जाता है। श्योपुर सहित राजस्थान, उत्तरप्रदेश, हरियाणा सहित देशभर में माता के भक्त मौजूद हैं, जो नवरात्र पर माता के दर्शन करने जरूर आते हैं। मंदिर की प्रसिद्घि के चलते ही यहां पर 1975 में नेरोगेज स्टॉफ स्टेशन बनाया गया था। माता के दर्शनों के लिए पहुंचने का सबसे सुगम मार्ग नेरोगेज है। वर्तमान में मंदिर की पुजा पं. बनवारीलाल पाराशर द्वारा की जाती है। मंदिर के बाहर गेट पर लगाए गए 2 बड़े शेर सभी के आकर्षण का केंद्र है। इस मंदिर पर हर चैत्रीय और शारदीय नवरात्र में नौ दिन तक मेला लगता है। मंदिर के मुख्य द्वार पर ही रेलवे स्टेशन है जहां प्लेटफार्म पर दोनों ओर मेले की दुकानें लगती हैं। नवरात्र की सप्तमी की रात में कालरात्रि जागरण होता है जिसमें माता को काले रंग की पोशाक पहनाई जाती है। कैसे पहुंचे मंदिर पर - श्योपुर से नैरोगेज के माध्यम से 25 किमी दूर । - श्योपुर से कैनाल मार्ग से 30 किमी सफर तय कर। - श्योपुर से मानपुर से होकर जाने पर 55 किमी दूरी तय करनी पड़ेगी। - ग्वालियर से नैरोगेज के माध्यम से 190 किमी दूरी तय कर पहुंचा जा सकता है। - ग्वालियर से श्योपुर होते हुए मंदिर पर पहुंचने के लिए 250 किमी दूरी तय करना पड़ेगी।

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