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इस मंदिर में है स्फटिक मणि से बनी एकमात्र त्रिपुर सुंदरी प्रतिमा

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रायपुर। राजधानी से 10 किलोमीटर दूर मतरी रोड पर स्थित देवपुरी में भगवती राज राजेश्वरी ललिता प्रेमाम्बा त्रिपुर सुंदरी का प्रदेश में एकमात्र मंदिर है। इस मंदिर की खासियत यह है कि मंदिर में प्रतिष्ठापित देवी की प्रतिमा स्फटिक मणि से निर्मित है। पूरे विश्व में स्फटिक मणि से बनी प्रतिमा कहीं और नहीं है। 5 मई, 2006 को गुरु पुष्य योग में श्रीअनंत विभूषित जगतगुरु ज्योतिष पीठाीश्वर एवं शारदा पीठाधीश्वर स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती महाराज ने इसकी स्थापना करवाई थी। छत्तीसगढ़ के सर्वांगीण विकास के उद्देश्य से रत्नमयी भगवती की स्थापना मंदिर के प्रमुख आचार्य ब्रह्मचारी डॉ.इन्दुभवानंद महाराज बताते हैं कि स्फटिक रत्नमयी मूर्ति की स्थापना से भौतिक ऐश्वर्य में वृद्धि होती है। छत्तीसगढ़ के सर्वांगीण विकास के उद्देश्य से ही रत्नमयी भगवती को प्रतिष्ठापित किया गया है। भगवान आदि शंकराचार्य ने जन-जन में एकता बनी रहे इसलिए देश के अलग-अलग कोनों में चार मठ की स्थापना की। प्रत्येक मठ में श्रीयंत्र का पूजन और भगवान चंद्रमौली की उपासना को अनिवार्य किया था। उन्हीं के आदेशों का अनुसरण करके मंदिर में श्रीयंत्र को भी पूजा जाता है। दक्षिण भारत की तंजावुर शैली में बना गुंबद जिस तरह दक्षिण भारत के मंदिरों का निर्माण किया जाता है, उसी तर्ज पर दक्षिण की तंजावुर शैली में मंदिर का ऊपरी हिस्सा और गुंबद बनाया गया है। इसमें 10 महाविद्या और 64 योगिनी की मूर्तियां बनी है। मुख्य द्वार पर लक्ष्मी के दो रूप श्यामा और दंडिनी के रूप में विराजित किया गया है। श्यामा रूप यानी जो भक्तों को अपनी ओर खींचे तथा दंडिनी रूप जो दंड देने वाली हो। श्रीयंत्र के पांच कोनों की शक्ति और चार की शिव-पार्वती रूप में पूजा मान्यता है कि लक्ष्मी ने राज राजेश्वरी की साधना अनंत वर्षों तक की थी। माता प्रसन्न् हुई तो लक्ष्मी ने वरदान में माता का स्वरूप मांगा। इसके बाद राज राजेश्वरी को श्री के रूप में पूजा जाने लगा। श्री यंत्र के नौ कोनों में पांच कोने शक्ति के रूप में और चार शिव-पार्वती के रूप में पूजे जाते हैं। पूजा की विधि भी अंतर्योग और बहिर्याग दो तरह से होती है। नवरात्र में प्रतिदिन चढ़ता है एक हजार कमल फूल त्रिपुर सुंदरी माता की पूजा में पूरे नौ दिनों तक एक हजार कमल के फूल अर्पित किए जाते हैं और रत्नों की पुष्पाजंलि दी जाती है। साथ ही काजू, किशमिश, बादाम, गुलाब फूल से अर्चन किया जाता है। यज्ञशाला, गौशाला, पाठशाला और पाकशाला धर्म के चार स्तंभ का पालन मंदिर में होता है। इनमें यज्ञशाला में हवन, पूजन, गौशाला में गौ सेवा, पाठशाला में बच्चों को वेद-पुराण का ज्ञान और पाकशाला में भगवान को लगने वाला भोग तैयार किया जाता है। दशहरा के दिन छप्पन भोग मंदिर में श्रद्धालुओं की 500 जोत प्रज्ज्वलित की जा रही है। नवमी को सुबह हवन, दोपहर को 300 कन्याओं को भोजन और भक्तों के लिए भंडारा तथा दशहरा के दिन देवी मां को 56 भोग अर्पित किया जाएगा।

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