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मध्यप्रदेश विधानसभा 2018 विशेष खोया जनाधार वापस पाने कांग्रेस को करिश्मे की उम्मीद (शाजापुर विधानसभा चुनाव - 2018 )

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शाजापुर । शाजापुर जिले के अन्तर्गत तीन विधानसभा सीट शामिल हैं सियासी इतिहास देखा जाये तो कभी यह कांग्रेस का गढ़ हुआ करता था लेकिन पिछले चार चुनावो से यहाँ भाजपा का दबदबा बढ़ा है। शाजापुर में जातिगत समीकरण हमेशा से निर्णायक भूमिका निभाते रहे हैं। जिले की तीन विधानसभा सीट शाजापुर कालापीपल और शुजाल पुर पर फिलहाल भाजपा का कब्ज़ा है। कांग्रेस को इस बार कमलनाथ के नेतृत्व में इस बार करिश्मे की उम्मीद है। शुजालपुर : शाजापुर जिले में आने वाली शुजालपुर विधानसभा पूरी तरह से ग्रामीण परिवेश वाली सीट है और यहां की अधिकतर आबादी ग्रामीण इलाकों में ही रहती है। कभी कांग्रेस की गढ़ रही इस सीट पर बीते 15 सालों से बीजेपी काबिज हैं और वर्तमान विधायक जसवंत सिंह हाड़ा लगातार दो चुनाव जीत चुके हैं। शुजालपुर के सियासी समीकरण की बात की जाए तो कभी कांग्रेस की मजबूत गढ़ रही इस विधानसभा सीट पर 2003 से बीजेपी काबिज है..और वर्तमान विधायक जसवंत सिंह हाड़ा लगातार दो बार से विधायक हैं। दरअसल पिछले दो चुनाव में कांग्रेस की आपसी गुटबाजी के चलते बीजेपी को जीत मिली है। राजपूत और परमार वोटर्स यहां बड़ी सियासी ताकत हैं, जिन्हें साधे बिना सीट को जीतना आसान नहीं। 1998 में शुजालपुर से कांग्रेस के केदारसिंह मंडलोई करीब 15 हजार मतो से जीते थे। यह सीट वैसे तो कांग्रेस की रही है, लेकिन 2003 में भाजपा के फुलसिंह मेवाड़ा करीब 25 हजार वोटो से चुनाव जीते थे। वहीं 2008 के विधानसभा चुनाव में भाजपा से जसवंत सिंह हाड़ा ने कांग्रेस के महेंद्र जोशी को 10414 मतों से परास्त किया था। इसी प्रकार 2013 के विधानसभा चुनाव में एक बार फिर भाजपा से जसवंत सिंह हाड़ा और कांग्रेस से महेंद्र जोशी मैदान में थे। एक बार फिर जसवंत सिंह हाड़ा ने महेंद्र जोशी को 8656 मतों से शिकस्त दी। शुजालपुर विधानसभा में बीते 15 सालों से कमल खिल रहा है इस सीट का जाति समीकरण भी दिलचस्प है जो चुनावों को प्रभावित करता है। यहां परमार समाज के 20 हजार मतदाता है जो हमेशा से निर्णायक भूमिका में रहे है। वहीं राजपूत समाज के 22हजार मतदाता भी हैं। कुल मिलाकर जाति समीकरण के साधे बिना शुजालपुर के किले पर फतह हासिल करना मुश्किल है। शाजापुर : ग्रामीण और शहरी परिवेश वाली शाजापुर विधानसभा में फिलहाल बीजेपी के अरुण भीमावद विधायक हैं। उन्होंने पिछली बार कांग्रेस के कद्दावर नेता हुकुम सिंह कराड़ा को मात दी थी।शाजापुर के सियासी मिजाज की बात करें तो भले ही सीट पर बीजेपी काबिज हो। लेकिन 2013 तक ये विधानसभा क्षेत्र कांग्रेस का मजबूत किला हुआ करता था। कांग्रेस के हुकुम सिंह कराड़ा यहां लगातार 25 साल तक विधायक रहे। ग्रामीण क्षेत्र होने के कारण यहां के वोटर्स का झुकाव कांग्रेस की तरफ रहा है। लेकिन पिछले चुनाव के बाद यहां के सियासी फिजा में बदलाव महसूस की जा सकती है। शाजापुर में 25 सालों बाद कांग्रेस के तिलिस्म को तोड़ने में सफल हुई बीजेपी तो उसमें बीजेपी के अरुण भीमावद की अहम भूमिका रही। उन्होंने 25 वर्षों तक कांग्रेस का परचम लहराने वाले हुकूमसिंह कराड़ा को हराया और शाजापुर की सियासत में अपनी धाक जमाई। कांग्रेस के किले को भेदते हुए उन्होंने कुल 76,911 मत प्राप्त करते हुए 1938 मतों से जीत हासिल की । जबकि कराड़ा अपने खाते में 74,973 वोट पर सिमटकर रह गए। सीट के सियासी इतिहास की बात की जाए तो ग्रामीण परिवेश वाली इस सीट पर शुरू से कांग्रेस का दबदबा रहा है और 1994 से 2013 तक कांग्रेस के हुकूम सिंह कराड़ा यहां से विधायक रहे। शाजापुर में हूकूम सिंह कराड़ा के दबदबे का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि 2003 में उमा भारती लहर में भी वे 18 हजार वोटों से चुनाव जीते थे। लेकिन 2013 के विधानसभा चुनाव में उन्हें अरुण भीमावद के हाथों हार का सामना करना पड़ा। हालांकि हुकूम सिंह कराड़ा 1600 वोटों के बेहद कम मार्जिन से चुनाव हारे थे। इस चुनाव में बीजेपी को जहां 76911 वोट मिले, वहीं कांग्रेस को 74973 वोट मिले। कालापीपल : 2008 के चुनाव में परिसीमन के बाद बनी कालापीपल विधानसभा सीट पर पहली बार चुनाव हुए जिसमे भाजपा को जीत मिली। पिछले दोनों चुनाव भाजपा के पक्ष में रहे। 2013 में भाजपा के इंदर सिंह परमार ने कांग्रेस के श्री कैदार सिंह मंडलोई को 9573 मतों से शिकस्त दी थी। २००८ के चुनाव में कांग्रेस की सरोज सिंह को भाजपा के बाबूलाल वर्मा ने 13232 वोटों से पराजित किया था।

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