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(भोपाल) जमानत जब्त कराने और वोट काटने लड़ते हैं चुनाव (मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव विशेष)

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भोपाल । मध्यप्रदेश के पिछले 14 विधानसभा चुनावों का रिकॉर्ड बताता है कि औसत 72 फीसदी की जमानत जब्त हो जाती है। 1951 से 2013 के बीच हुए इन विधानसभा चुनावों में कुल 31,519 प्रत्याशियों ने किस्मत आजमाई, जिनमें से 22,907 जमानत नहीं बचा पाए। 2018 में होने वाले मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले पार्टियों में टिकट की दावेदारी का जबरदस्त माहौल है। भाजपा और कांग्रेस जैसे राष्ट्रीय दलों के अलावा कई क्षेत्रीय दल भी अपने प्रत्याशी उतारेंगे। बड़ी संख्या में पैराशूट नेता और निर्दलीय भी मैदान में होंगे।प्रदेश के अब तक हो चुके हर विधानसभा चुनाव के आंकड़ों का विश्लेषण करने से पता चलता है कि बड़ी संख्या में नेता किस्मत आजमाते हैं, लेकिन जमानत भी जब्त करवा बैठते हैं। दरअसल जीतना हर कोई चाहता है, लेकिन फिर भी कई उम्मीदवारों का मकसद चुनाव में अपनी मौजूदगी दर्ज कराना, हार तय दिखाई दे फिर भी लडऩा और अपने पक्ष में समर्थन हो या न हो, लड़ कर अपना लोहा मनवाने की पूरी कोशिश करना होता है।लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 34(1)(ख) के अनुसार, यदि कोई प्रत्याशी कुल मान्य वोटों के छठे हिस्से के बराबर वोट हासिल नहीं कर पाता है तो उसकी जमानत जब्त हो जाती है। उदाहरण के लिए, किसी विधानसभा में दस लाख मत पड़े हैं तो जो प्रत्याशी 1,66,666 से कम वोट लाएगा उसकी जमानत के रूप में जमा करवाई गई राशि वापस नहीं मिलेगी।विधानसभा चुनाव लडऩे वाले सामान्य श्रेणी के उम्मीदवार को 10,000/- रुपए बतौर जमानत जमा करने होते हैं। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के प्रत्याशियों के लिए यह राशि 5000 रुपए है। 2010 से पहले सामान्य श्रेणी के लिए यह राशि 250 रुपए और एससी-एसटी के लिए 125 रुपए जमानत राशि थी। यह राशि चुनाव आयोग के खाते में जमा रहती है।जमानत खोने वाले प्रत्याशियों के रोचक आंकड़े: मध्यप्रदेश में अब तक 14 चुनाव हुए हैं। 2013 में कुल 2813 प्रत्याशियों ने चुनाव लड़ा था, जिनमें से 2313 (82 प्रतिशत) की जमानत जब्त हो गई। 1990 के चुनावों में सबसे ज्यादा 3521 प्रत्याशियों की जमानत जब्त (83 प्रतिशत) हुई थी।देश में ऐसे भी रोचक मामले सामने आए हैं, जब प्रत्याशी चुनाव जीत गया, लेकिन उसकी जमानत जब्त हो गई। 1990 के बिहार विधानसभा चुनाव में फारबिसगंज सीट से भाजपा के मायानंद ठाकुर जीते, लेकिन उनके वोट कुल मतों का 1/6 हिस्सा नहीं थे। उन्हें 95,350 में से 15,777 वोट ही मिले। बाकी प्रत्याशियों के वोट इससे भी कम थे, इसलिए मायानंद चुनाव जीत गए, लेकिन नियमानुसार जमानत भी जब्त हो गई. 2012 में दिल्ली नगर निगम के चुनाव में वार्ड क्रमांक 134 के चुनाव में भी ठीक ऐसा ही हुआ था।

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