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अध्यादेश लाना है तो सर्वधर्म केंद्र के लिए लाएं (लेखक-डॉ. वेदप्रताप वैदिक)

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अयोध्या में राम मंदिर का मसला 2019 के चुनाव के पहले हल होता हुआ मुझे नहीं लगता और यदि चुनाव के पहले यह हल नहीं होगा तो यह भाजपा के लिए गंभीर चुनौती सिद्ध हो सकता है। सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले को जनवरी 2019 तक के लिए टाल दिया है। अब से तीन महिने वह लगाएगा, उस बेंच को नियुक्त करने में, जो यह तय करेगी कि 2010 में दिया गया इलाहाबाद उच्च न्यायालय का फैसला ठीक है या नहीं। उसके फैसले में जजों ने राम जन्मभूमि की 2.77 एकड़ जमीन को तीन दावेदारों में बांट दिया था। एक रामलला, दूसरा निर्मोही अखाड़ा और तीसरा सुन्नी वक्फ बोर्ड। जनवरी 2019 में राम-मंदिर विवाद का फैसला नहीं होगा। इस मुकदमे को सुननेवाली सिर्फ बेंच बनेगी। वह बेंच क्या इस विवाद को रोजाना सुनवाई के आधार पर तय करेगी ? मुख्य न्यायाधीश ने पिछली बहस के वक्त यह स्पष्ट कर दिया था कि मंदिर-मस्जिद का मामला इतना संगीन नहीं है कि इस पर तुरंत विचार किया जाए। पिछले आठ साल से यह मामला सबसे ऊंची अदालत में जरुर अटका हुआ है लेकिन जरा यह तो सोचिए कि 2019 के चुनाव के पहले वह इसका फैसला कैसे सुना सकती है ? इस विवाद से संबंधित सदियों पुराने दस्तावेज कई हजार पृष्ठों में फैले हुए हैं और वे संस्कृत, प्राकृत, अरबी, फारसी और हिंदी में हैं। हमारे जजों को अंग्रेजी में काम करने की आदत है। वे इन दस्तावेजों से कैसे पार पाएंगे ? जब तक इन दस्तावेज का अंग्रेजी अनुवाद उपलब्ध नहीं होगा, जजों को इंतजार करना पड़ेगा। इसके अलावा मुख्य प्रश्न यह है कि अदालत किस मुद्दे पर फैसला देगी ? उसके सामने मुद्दा यह नहीं है कि अयोध्या में राम मंदिर बने या मस्जिद बने बल्कि यह है कि उस 2.77 एकड़ जमीन पर किसकी मिल्कियत है ? इलाहाबाद न्यायालय ने दो-तिहाई जमीन तो हिंदू संस्थाओं को दे दी है और एक तिहाई मुस्लिम संस्था को। मान लें कि वह सारी जमीन दोनों में से किसी एक को दे दे तो क्या दूसरे लोग उस फैसले को मान लेंगे ? यदि 2.77 एकड़ जमीन सुन्नी वक्फ बोर्ड को मिल गई तो क्या हिंदू संगठन अदालत का आदर करेंगे ? अदालत के लिए यह मामला विश्वास और श्रद्धा का नहीं, कब्जे और कानून का है। मान लें कि सर्वोच्च न्यायालय उसी फैसले पर मोहर लगा दे, जो उच्च न्यायालय ने दिया है तो क्या होगा ? तो क्या निर्मोही अखाड़ा उस दो-तिहाई जमीन पर, जो दो एकड़ से भी कम है, मंदिर बनाना पसंद करेगा ? और क्या वह यह भी पसंद करेगा कि मंदिर की दीवार से सटकर वहां एक बाबरी मस्जिद दुबारा खड़ी हो जाए ? क्या उस राम जन्मभूमि में मंदिर और मस्जिद साथ-साथ रह पाएंगे, खास तौर से बाबरी मस्जिद के ढांचे को ढहाने की घटना के बाद ? दूसरे शब्दों में इस मंदिर-मस्जिद के विवाद को हल करने के लिए अदालत की शरण में जाना मुझे बिल्कुल समझ में नहीं आता। अदालतों के सैकड़ों फैसले आज भी ऐसे हैं, जिन्हें कभी लागू ही नहीं किया जा सका। सर्वोच्च न्यायालय ने सबरीमाला मंदिर में स्त्रियों के प्रवेश का जो फैसला किया है, उसकी कितनी दुर्गति हो रही है ? केरल की मार्क्सवादी सरकार और हमारी केंद्र की सरकार क्या कर पा रही है ? मंदिर-मस्जिद विवाद को अदालत की खूंटी पर टांगकर हमारे नेतागण खर्राटे खींच रहे हैं। यह स्थिति हमारी राजनीतिक दरिद्रता की परिचायक है। पिछले चार साल देखते-देखते निकल गए। अब चुनाव के बादल जबकि सिर पर मंडरा रहे हैं, भगवान राम याद आ रहे हैं। सारे मसले को सांप्रदायिक रंग दिया जा रहा है। कुछ संगठन कह रहे हैं कि वे 6 दिसंबर से ही मंदिर का निर्माण-कार्य शुरु कर देंगे और कुछ नेता अब मंदिरों, शिवालयों और आश्रमों के चक्कर लगा रहे हैं। उन्हें लग रहा है कि राम मंदिर का मामला तूल पकड़नेवाला है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने एक अध्यादेश लाने की मांग की है। यदि मंदिर-मस्जिद का मामला मजहबी रंग पकड़ता है तो यह भारत का दुर्भाग्य होगा। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और विश्व हिंदू परिषद ने राम मंदिर का मोर्चा दुबारा खोल दिया है। मुझे आश्चर्य है कि ये पिछले चार साल मौन-व्रत क्यों धारण किए रहे ? मेरे लिए अयोध्या में राम मंदिर मजहबी मसला है ही नहीं। उसे हिंदू-मुसलमान का मसला बनाना बिल्कुल गलत है। यह मसला है, देसी और विदेशी का ! यह बात मैं अपने बड़े भाई तुल्य अशोक सिंघलजी, जो कि विश्व हिन्दू परिषद के बरसों—बरस अध्यक्ष रहे, से भी हमेशा कहता रहता था। विदेशी आक्रांता जब भी किसी देश पर हमला करता है तो उसके लोगों का मनोबल गिराने के लिए वह कम से कम तीन काम जरुर करता है। एक तो उसके श्रद्धा-केंद्र और पूजा-स्थलों को नष्ट करता है। दूसरा, उसकी स्त्रियों को अपनी हवस का शिकार बनाता है और तीसरा, उसकी संपत्तियों को लूटता है। जहां तक बाबर का सवाल है, उसने और उसके-जैसे हमलावरों ने सिर्फ भारत में ही नहीं, उज़बेकिस्तान और अफगानिस्तान में भी कई श्रद्धा-केंद्र को नष्ट किया। वे मंदिर नहीं थे। वे मस्जिदें थीं। वे दुश्मनों की मस्जिदें, उनकी औरतें और उनकी संपत्तियां थीं। यह जानना हो तो आप पठानों के महान कवि खुशहालखान खट्टक की शायरी पढ़िए। सहारनपुर के प्रसिद्ध उर्दू शायर हजरत अब्दुल कुद्दुस गंगोही का कलाम देखिए। उन्होंने लिखा है कि मुगल हमलावरों ने जितने मंदिर गिराए, उनसे ज्यादा मस्जिदें गिराईं। औरंगजेब ने बीजापुर की बड़ी मस्जिद गिराई थी, क्योंकि उसे बीजापुर के मुस्लिम शासक को धराशयी करना था। इसीलिए मैं कहता हूं कि अयोध्या के राम मंदिर को मीर बाक़ी ने गिराया हो या किसी और ने, यह सवाल मज़हबी नहीं, राष्ट्रीय है। अब मेरी राय यह है कि देश के मुसलमानों को पहल करनी चाहिए और राम जन्मभूमि की जगह विश्व का भव्यतम मंदिर ही बनने देना चाहिए और उस 70 एकड़ जमीन में एक शानदार मस्जिद के साथ-साथ दुनिया के सभी प्रमुख धर्मों के पूजा-स्थल भी बन सकें, ऐसा एक अध्यादेश सरकार को तुरंत लाना चाहिए ताकि अयोध्या सर्वधर्म समभाव का विश्व-केंद्र बन सके। अध्यादेश लाने के पहले देश के सभी प्रमुख नेताओं को संबंधित पक्षकारों से मिलकर सर्वसम्मति का निर्माण करना चाहिए ताकि उस अध्यादेश को कानून बनाने में कोई अड़चन आड़े नहीं आए। इसी आशय का अध्यादेश 1993 में प्रधानमंत्री नरसिंहराव ने जारी करवाया था और 1994 में संसद ने उसे कानून का रुप दिया था। इसी कानून को थोड़ा बेहतर और सर्वसमावेशी बनाकर यदि सर्वसम्मति से लागू किया जाए तो सर्वोच्च न्यायालय का भी कष्ट दूर होगा और भारत में सांप्रदायिक सद्भाव की नई लहर चल पड़ेगी।

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