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छत्तीसगढ़ में दो पार्टियों का राज, तीसरी ताकत को नहीं कोई स्थान (छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव विशेष)

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रायपुर । छत्तीसगढ़ की 18 वर्ष की सियासत में कोई भी राजनीतिक दल चुनाव में तीसरी ताकत बनकर नहीं उभर पाया। राज्य में हर बार पांच राष्ट्रीय, आधा दर्जन क्षेत्रीय पार्टियों के साथ दर्जनभर से अधिक गैरमान्यता प्राप्त पार्टियां भाग्य आजमाती हैं।चुनाव अभियान के दौरान कई सीटों पर त्रिकोणीय व बहुकोणीय मुकाबला भी नजर आता है, लेकिन ज्यादातर सीटों पर भाजपा और कांग्रेस के बीच ही सीधा मुकाबला होता है। बाकी पार्टियों के अधिकांश प्रत्याशी अपनी जमानत भी नहीं बचा पाते हैं।दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों के अलावा कोई भी दल कुल वोट के प्रतिशत में दहाई का आंकड़ा भी नहीं छू पाया है। वर्ष 2003 के चुनाव में कांग्रेस से अलग हुए एक धड़े (वीसी खेमा) ने एनसीपी के बैनर तले चुनाव लड़ा था। एनसीपी ने सात फीसद वोट हासिल किया, जो अब तक किसी तीसरी पार्टी के हिस्से में आया, सबसे अधिक वोट है। इस बार फिर कांग्रेस से अलग हुआ एक धड़ा (जोगी खेमा) चुनावी समर में है। राजनीतिक विश्लेषक जोगी की पार्टी जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ को तीसरी ताकत मान रहे हैं हालांकि जोगी अपनी पार्टी को छत्तीसगढ़ की पहली क्षेत्रीय ताकत कहते हैं और सरकार बनाने का भी दावा कर रहे हैं। जोगी के दावे में कितना दम है यह तो दिसंबर के पहले सप्ताह तक ही स्पष्ट हो पाएगा। छत्तीसगढ़ विधानसभा के इतिहास के डॉ. विमल चोपड़ा पहले निर्दलीय विधायक हैं। 2013 में महासमुंद से विधानसभा टिकट की दावेदारी कर रहे डॉ. चोपड़ा ने टिकट नहीं मिलने से नाराज होकर भाजपा छोड़ दी थी। 2003 व 2008 के चुनाव में 250 से 350 लोगों ने निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में भाग्य आजमाया था, लेकिन कोई जीत नहीं पाया। राष्ट्रीय दलों में भाजपा व कांग्रेस के बाद बसपा ही एकमात्र पार्टी है, जिसके विधायक हर बार सदन में रहते हैं। 2003 व 2008 में पार्टी के दो- दो विधायक चुने गए। 2013 में एक विधायक चुना गया। बसपा लगभग सभी 90 सीटों पर प्रत्याशी खड़ी करती है, इसके बावजूद उसका असर सीमित है। राज्य के पहले विधानसभा चुनाव 2003 में कांग्रेस के दिग्गज नेता वीसी यानी विद्याचरण शुक्ल ने पार्टी से बागवत कर छत्तीसगढ़ में शरद पवार की राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) को खड़ा किया।चुनाव से चंद महीने पहले ही एनसीपी ने राज्य की राजनीति में प्रवेश किया, इसके बावजूद पूरे चुनाव के दौरान माहौल बना रहा। पार्टी के खाते में करीब सात फीसद वोट पड़े। इसके बावजूद पार्टी केवल एक सीट जीत पाई है।राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि इन्हीं सात फीसद वोटों के कारण राज्य में पहली बार भाजपा सत्ता में आई। छत्तीसगढ़ व स्थानीय के नाम पर राजनीति करने वाली पार्टियां भी अब तक के चुनावों में कोई खास असर नहीं डाल पाई हैं। गोंडवाना गणतंत्र पार्टी (गोगंपा), छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा (छमुमो) और छत्तीसगढ़ समाज पार्टी (छसपा) के कई प्रत्याशी चुनाव लड़ते हैं, लेकिन उनकी जमानत भी नहीं बच पाती है।

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