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चर्चा में लोह पुरूष ‘सरदार’ के दर्शन.....? (लेखक- ओमप्रकाश)

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इन दिनों देश में लोह पुरूष सरदार वल्लभ भाई पटेल की चर्चाओं का दौर जारी है, गुजरात के नर्मदा तट स्थित सरदार सरोवर बांध पर जहां प्रधानमंत्री नरेन्द्र भाई मोदी ने विश्व की सबसे ऊँची सरदार की प्रतिमा का अनावरण कर अपना छः साल पुराना संकल्प पूरा किया और इस प्रतिमा के माध्यम से पूरे विश्व को ‘एकता’ का संदेश दिया, वहीं ‘‘दिए तले अंधेरे’’ की तर्ज पर उन्हीं के संगी-साथियों द्वारा मोदी जी से पूछा जा रहा है कि सरदार पटेल ने तो गुजरात में समुद्र तट पर सोमनाथ मंदिर का निर्माण करवा दिया था, अब क्या वे (मोदी) उन्हीं से प्रेरणा लेकर अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण करवाएगें? और राम मंदिर के नाम पर एकता के एक सूत्र में बंधे सत्तारूढ़ दल के संघ सहित सभी अनुषांगिक संगठनों की मनोकामना पूरी करेंगे? संघ तथा सभी अनुषांगिक संगठनों की मोदी जी से एक ही अपेक्षा है कि चूंकि लोकसभा चुनाव से पहले सुप्रीम कोर्ट के फैसले के आसार नजर नहीं आते, इसलिए सरकार के सामने सिर्फ अध्यादेश ही एक मात्र विकल्प शेष बचा है, तो अगले शीत कालीन सत्र में उक्त अध्यादेश लाकर व उसे संसद से पारित करवाकर अयोध्या में राम मंदिर निर्माण की शुरूआत करना चाहिए। भाजपा ही नहीं संघ तथा अनुषांगिक दलों की भी अब यह धारणा बलवती हो गई है कि अब 2019 में पुनः सत्ता प्राप्ति के लिए ‘राममंदिर’ के अलावा कोई विकल्प शेष नहीं बचा है, साथ ही यह सर्व सम्मत धारणा भी है कि यदि सरकार राम मंदिर को लेकर अध्यादेश लाती है तो कांग्रेस सहित कोई भी प्रतिपक्षी दल उसका विरोध इसलिए नहीं कर पाएगा, क्योंकि हर दल को अपने हिन्दू वोट बैंक की चिंता है, इस प्रकार यह अध्यादेश आसानी से संसद के दोनों सदनों में पारित हो जाएगा और उसके बाद न सिर्फ भाजपा और उसके चुनाव घोषणा-पत्र का एक प्रमुख संकल्प मूर्तरूप ले लेगा, बल्कि भाजपा को देश के आम वोटरों से वोट मांगने में भी आसानी हो जाएगी। यद्यपि यह सोच संघ और उसके अनुषांगिक संगठनों विहिप, बजरंग दल आदि की है, किंतु सत्तारूढ़ भाजपा की सोच कुछ अलग है, उसकी सोच है कि सुप्रीम कोर्ट वैसे ही सरकार के सामने मजबूत प्रतिपक्षी की भूमिका में है, एट्रोसिटी एक्ट को लेकर सरकार वैसे ही सुप्रीम कोर्ट से पंगा ले रही है, अब रफाल विमान मामले में भी सुप्रीम कोर्ट सरकार के सामने खड़ी है, ऐसी स्थिति में सुप्रीम कोर्ट के सामने विचाराधीन राम मंदिर वाले मामले पर सरकार अध्यादेश ले आती है तो वह सुप्रीम कोर्ट की सरकार विरोधी भट्टी में घी का काम करेगा और सुप्रीम कोर्ट सरकार के इस कदम से और नाराज हो जाएगी तथा फिर चुनाव के समय प्रजातांत्रिक स्तंभों के बीच नए विवाद शुरू हो जाएगें, इसलिए सरकार अध्यादेश जैसे कदम को उठाने से घबरा रही है। देश के राजनीतिक क्षेत्रों में तो यह भी चर्चा है कि सरकार यह अध्यादेश लाने के लिए सही समय का इंतजार कर रही है, अर्थात् सरकार ऐसे समय यह अध्यादेश जारी करना चाहती है, जब संसद उसे निर्धारित अवधि छः माह में उसे पारित नहीं कर पाए, क्योंकि आज यदि अध्यादेश लाया जाता है तो उसे संसद के शीत कालीन सत्र में पारित करवाने की भाजपा को मशक्कत करनी पड़ेगी और यदि यही अध्यादेश ऐसे वक्त लाया जाता है जब चुनाव पूर्व संसद का सत्र ही शेष न बचा हो तो इससे भाजपा ‘‘साँप’’ भी मार देगी और उसकी ‘‘लाठी’’ भी नहीं टूटेगी, इसलिए फिलहाल भाजपा व उसकी सरकार संघ के तीव्र अनुरोध के बावजूद या तो सुप्रीम कोर्ट के फैसले की रट लगा रही है या फिर इस मामले पर मौन धारण कर रही है, सही बात तो यही है कि भाजपा व सरकार सही वक्त के इंतजार में है और जैसे ही वह वक्त आएगा भाजपा की सरकार अध्यादेश का हथौड़ा चला देगी, फिर चाहे सुप्रीम कोर्ट कुछ भी प्रतिक्रिया रूपी कदम क्यों न उठाए? यह रहस्य भाजपाध्यक्ष अमित शाह व प्रधानमंत्री नरेन्द्र भाई मोदी को निकट से जानने वालों से छिपा नहीं है, इसीलिए वे आजादी के समय के द्रढ़ निश्चयी सरदार वल्लभ भाई पटेल से प्रधानमंत्री मोदी की तुलना कर रहे है, क्योंकि मोदी जी भी एक बार जो संकल्प ले लेते है, उसे ‘जिद’ में परिवर्तित कर उसे पूरी अवश्य करते है, फिर उन्हें आधुनिक लोह पुरूष (अडवानी जी) भी नहीं रोक पाते।

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