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दीवाली में पटाखा फोड़ना कितना लाभप्रद (लेखक-डॉक्टर अरविन्द जैन)

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हम जब कोई भी काम करते हैं तो उसका फायदा नुक्सान पर जरूर ध्यान देते हैं। यदि सौदा नुक्सान का हो और फिर भी हम करे तो यह शायद हमारी अयोग्यता का प्रदर्शन माना जाता हैं। दीवाली हमारे यहाँ प्रकाश का पर्व हैं और इसमें खुशियों का स्थान बहुत हैं। आज वैसे भी जीवन में खुशियां हैं भी नहीं और छोटी मोटी मिलती हैं तो उसमे पाबन्दी ,जो अब किसी को पसंद नहीं। पर यह जानना जरुरी हैं की हमारी खुशियां किसी के लिए या स्वयं के लिए हानिकारक तो नहीं हो रही हैं। यदि हम प्रकृति प्रेमी /पर्यावरण प्रेमी हैं तो क्या हम बिना पटाखे चलाये अपना त्यौहार नहीं मना सकते ? साथ ही हम प्रत्यक्ष्य में कितना नुक्सान अपनों के साथ प्रकृति को देते हैं जो अकल्पनीय हैं। हम मूक जानवरों पर भी अत्याचार कर रहे हैं और साथ में गर्भवती माँ ,श्वास ह्रदय रोगियों को भी नुक्सान पहुंचाते है। जी हाँ कुछ विचारणीय बिंदु आपके समक्ष विचार्थ हैं। पटाखों से हम एक दिन में अरबों रुपयों में आग लगा देते हैं ,जिससे नुक्सान ही नुक्सान हैं ,फायदा कुछ भी नहीं। जितने रुपयों के पटाखें हम एक दिन में फूंक देते हैं उसके बाद हमें उस क्षण की अनुभूति कितने समय होती हैं ,उतने रुपयों से हजारों परिवार का पेट पाला जा सकता हैं। पटाखों से हर साल कही न कहीं आग लगती ही हैं जिससे करोड़ों रुपयों की सम्पत्ति के साथ जन हानि भी होती हैं जिसके कारण अनेक परिवारों का जीवन अन्धकारमय हो जाता हैं। ये हादसे न केवल दीवाली को वरन पूरे वर्ष जहाँ जो उपयोग करता हैं होते हैं ,क्या यह हमारी समझदारी मानी जाए। पटाखों की तेज़ विस्फोटक आवाज़ से ,तेज़ रोशनी से ,बारूद के धुएं से जब बड़ों को परेशानी होती हैं तो गर्भस्थ शिशुओं एवं नवजात बच्चों का क्या हाल होता होगा ?उन्हें अनेक बीमारियां हो जाती हैं तथा गर्भस्थ शिशु जन्मजात बहरे होने का खतरा बढ़ जाता हैं। इस पाप के भागी-दार हम फटाखा फोड़कर बनते हैं ,क्या आप इससे प्रभावित तो नहीं हो रहे हैं ! भोगने वाले को ही अहसास होता हैं। फटाखों की तेज़ आवाज से ध्वनि प्रदुषण ,फटाखों के धुएं एवं उसकी गैसों से वायु प्रदुषण ,फटाखा जलने के बाद उसकी अवशिष्ट सामग्री से जल एवं मिटटी का प्रदुषण होता हैं जो की हम सभी के जीवन के लिए प्राणघातक हैं। पूरे वर्ष हम पर्यवरण की संभाल करना तथा एक दिन उसे यूँ बर्बाद करना क्या यह समझदार लोगों का काम हैं। अभी देश की राजधानी इस प्रकोप को नहीं झेल रही हैं। हम भी उस दिशा में जाना चाह रहे। गंभीरता से समझो. हमें आग की आंच /तपन से दर लगता हैं तो फटाखों की भयंकर आग से छोटे -छोटे प्राणियों का जल मरना तो निश्चित हैं। विज्ञान कहता हैं की फटाखों की आवाज़ से अनेक पशुओं के गर्भ गिर जाते हैं ,उसकी विषैली वायु से उन्हें अँधा बहरा बना देती हैं। महापर्व में महापाप का यह तांडव कितना उचित हैं। पशु पक्षियों की प्राकृतिक क्रियायों में बाधा पहुंचने से वे कई दिनों तक तनाव में रहते हैं. हम मानव पढ़े लिखे समझदार वर्षों से यह त्यौहार मनाते आ रहे हैं पर उससे क्या सीखा हमने। यही की फटाखों की तेज़ रोशनी से और बारूद आँखों में जाने से आँखें ख़राब हो जाती हैं। इसकी तेज़ आवाज से कानों के परदे तक फट जाते है। श्वास के रोगियों के लिए यह महापर्व आराधना का नहीं अपितु महा यातना का पर्व बन जाता हैं ,उन्हें अनचाही कैद का सामना करना पड़ता हैं। इस कुकृत्य का जिम्मेदार क्या फटका फोड़ने वाले नहीं हैं तो कौन हैं ?इससे कभी कभी असमय मौत भी हो जाती हैं। फटाखों के जलने से निकलने वाली कॉर्बन डाई ऑक्साइड एवं हानिकारक गैसों से वायुमंडल दूषित होता हैं ,जिससे ग्लोबल वॉर्मिंग का खतरा निरंतर बढ़ रहा हैं। शायद फटाखा फोड़ने वाले इससे प्रभावित नहीं होते होंगे। अब नहीं सम्हले तो कब सम्हलेंगे? किसी भी धरम में हिंसा करना ,दूसरों को पीड़ा पहुंचाने का उपदेश नहीं दिया गया हैं। हम फटाखा फोड़कर प्रकृति को नुक्सान पहुंचा रहे हैं और अनेक जीव जंतुओं को जिन्दा जलाकर ईश्वर की वाणी का अपमान /निरादर कर रहे हैं। बम विस्फोट करने वालों को हम आतंकवादी कहते हैं तो विश्व में प्रतिवर्ष फटाखों की आग से लाखों लोग अंधे /बहरे /घायल हो जाते हैं और हजारों की मौत हो जाती हैं। आपके फटाखा प्रेम के दुष्परिणाम देखने के लिए दीवाली के दूसरे दिन अपने नगर के हॉस्पिटल जरूर जाये और फिर स्वयं विचार करे की हम कौन हैं। क्या यह सोचने योग्य नहीं हैं -- हाथ जल गया तो इलाज़ का खरच ५००० रुपये और १५ दिन का आराम। मुँह जल गया तो इलाज का खरच १००००० रुपये आराम ३० दिन का कपडे जल गए तो नुकसान १००० रुपये का एक ड्रेस बर्बाद दूकान गोदाम में आग लग गई तो नुक्सान लाखों का दुःख बरसों बरस का यदि कोई अग्निकांड हो जाये तो करोड़ों का नुक्सान ,सैकंडों की मौत और चारो तरफ तबाही अंत में एक अर्ज़ हैं आप सभी से -- आप अपने ही हाथों से अपने परिश्रम की कमाई में आग लगा रहे हैं ना आप आगजनी की घटनों को आमंत्रण दे रहे हैं। आप हवा में बारूद का जहर घोल रहे हैं। आप बच्चों को अभी से हिंसा करना सीखा रहे हैं। ओजोन पर्त को नुक्सान पंहुचा रहे हैं बालकों को फ़िज़ूलख़र्ची ,दिखावा ,व्यर्थ की होड़ के कुसंस्कार दे रहे हैं। बेचारे मूक निर्दोष पशुओं पक्षियों के घर उजाड़ रहे हैं और उनकी मौत का सामान तैयार कर रहे हैं। फटाखों की आवाज एवं जहरीली हवा से लोगों की शांति भांग कर रहे हैं। पाश्चायात देशों की नक़ल करके अपनी गुलामी दिखा रहे हैं। महापुरुषों के चित्रों वाले फटाखे फोड़कर उनका अपमान कर रहे हैं। अब भी क्या हम दीवाली मना रहे हैं ?इतना जानने के बाद भी यदि आपके हाथों फटाखे नहीं छूटते तो कम से कम प्रदर्शन के लिए पटाखे न छोड़े ,कम से कम फटाखे चलाएं। अधिक आवाज एवं धुएं वाले फटाखे /विदेशी न चलाएं महापुरुषों के चित्र वाले फटाखे न फोड़े। क्या अन्य धर्माबलंबियों के भगवानों के चित्र लगाए जाते हैं। नहीं कभी नहीं। तो फिर क्या हमारे भगवान्। देवी देवता इसके लिए हैं। क्या हम यह नहीं कर सकते ----- हम इस धन राशि का उपयोग तीर्थ यात्रा या शिक्षण शिविर में लगाए। बच्चों को अध्ययन हेतु पुस्तके दे या सहयोग दे या अपनी क्षमता /योग्यता के अनुसार कोई भी ऐसा कार्य करे जो स्व-हित/परोपकार के लिए कर सके.एक वर्ष का फोड़कर स्वयं समझे इसके लाभ और यह त्यौहार आत्मानंदनुभूति का हैं। जो बात दूसरों के लिए हानिकारक हो या स्वयं के लिए आप क्या अपनाएंगे ?

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