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सिब्बल बोले- केंद्र का रवैया यही रहा तो सीसीटीवी और ईसी का भी यही हश्र होगा

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दिल्ली । सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को सीबीआई निदेशक आलोक कुमार वर्मा की याचिका पर सुनवाई शुरू हो गई है। सुनवाई के दौरान आलोक वर्मा के वकील फली नरीमन ने दलील दी है कि कमेटी की सिफारिश पर ही सीबीआई डायरेक्टर नियुक्त किया है। डायरेक्टर का कार्यकाल न्यूनतम दो साल होता है। अगर इस दौरान असाधारण हालात में सीबीआई निदेशक का ट्रांसफर किया जाना है तो कमेटी की अनुमति लेनी होगी। लंच के बाद फिर से शुरू हुई बहस में दुष्यंत दवे ने कहा कि सीबीआई के फैसलों में सीवीसी या फिर सरकार जैसे किसी तीसरे पक्ष का दखल नहीं होना चाहिए। दवे के बाद मल्लिकार्जुन खड़गे की ओर से कपिल सिब्बल ने बहस की। सिब्बल ने कहा कि सीवीसी और सरकार एक्ट की अनदेखी और मनमानी कर सीबीआई निदेशक को छुट्टी पर नहीं भेज सकती। नियुक्ति और हटाने या निलंबन के आदेश सिर्फ सेलेक्शन कमेटी कर सकती है। ये मामला कमेटी के पास भेजना था। अगर ऐसे फैसलों और प्रक्रिया को हम मंज़ूर करेंगे तो सीबीआई की स्वायत्तता का क्या मतलब रह जाता है? अगर कमेटी के अधिकार सरकार हथिया लेगी तो जो आज म्ंग् निदेशक के साथ हो रहा है, वही कल सीवीसी और ईसीआई के साथ भी हो सकता है। उन्होंने कहा कि ट्रांसफर में नियमों का पालन नहीं किया है। नरीमन ने कहा कि आलोक वर्मा की नियुक्ति १ फरवरी २०१७ को की गई थी। नियमानुसार उनका कार्यकाल पूरे दो साल तक है। अगर उनका ट्रांसफर ही करना था तो सेलेक्शन कमेटी करती। कोर्ट में नरीमन ने सीवीसी का आदेश पढ़ते हुए कहा कि सीबीआई अधिकारी से सारी शक्तियां लेकर उनका ट्रांसफर कर दिया गया, जो नियमों के खिलाफ है। अगर सरकार को कुछ गलत लगता तो उसे पहले समिति में जाना चाहिए था। उनसे संपर्क करना चाहिए था। नरीमन की दलील पर जज ने पूछा कि अगर सीबीआई डायरेक्ट को घूस लेते रंगे हाथ पकड़ लिया जाए तो क्या कार्रवाई करनी चाहिए। इस पर नरीमन ने कहा कि उन्हें फौरन कमेटी में जाना चाहिए। मनीष सिन्हा की याचिका पर नरीमन ने पूछा कि एक मामला कोर्ट में दाखिल हुआ हो और सुनवाई के लिए नहीं आया हो तो क्या छपने पर कार्रवाई हो सकती है? इस पर कोर्ट ने कहा कि सुनवाई पर आने से पहले दाखिल हुई याचिका छापी जा सकती है। उस पर कोई प्रतिबंध नहीं है। सुप्रीम कोर्ट का ही फैसला है कि ये पब्लिश किए जा सकते हैं। भारतीय पुलिस सेवा के वरिष्ठ अधिकारी वर्मा ने छुट्टी पर भेजे जाने के केंद्र सरकार के निणय को चुनौती दी है। प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति संजय किशन कौल और न्यायमूर्ति के एम जोसेफ की पीठ वर्मा के सीलबंद लिफाफे में दिए गए जवाब पर विचार कर सकती है। केन्द्रीय सतर्कता आयोग ने वर्मा के खिलाफ प्रारंभिक जांच कर अपनी रिपोर्ट दी थी और वर्मा ने इसी का जवाब दिया है। पीठ को आलोक वर्मा द्वारा सीलबंद लिफाफे में न्यायालय को सौंपे गए जवाब पर २० नवंबर को विचार करना था किंतु उनके खिलाफ सीवीसी के निष्कर्ष कथित रूप से मीडिया में लीक होने और जांच एजेंसी के उपमहानिरीक्षक मनीष कुमार सिन्हा द्वारा एक अलग अर्जी में लगाए गए आरोप मीडिया में प्रकाशित होने पर न्यायालय ने कड़ी नाराजगी व्यक्त करते हुए सुनवाई स्थगित कर दी थी। पीठ द्वारा जांच एजेंसी के कार्यवाहक निदेशक एम नागेश्वर राव की रिपोर्ट पर भी विचार किए जाने की संभावना है। नागेश्वर राव ने २३ से २६ अक्टूबर के दौरान उनके द्वारा लिए फैसलों के बारे में सीलबंद लिफाफे में रिपोर्ट दाखिल की है। जांच एजेंसी के अधिकारियों के खिलाफ शीर्ष अदालत की निगरानी में स्वतंत्र जांच के अनुरोध वाली जनहित याचिका पर भी पीठ सुनवाई कर सकती है। गैर सरकारी संगठन कामन काज ने यह याचिका दाखिल की है। न्यायालय ने २० नवंबर को स्पष्ट किया था कि वह किसी भी पक्षकारको नहीं सुनेगी और यह उसके द्वारा उठाए गए मुद्दों तक ही सीमित रहेगी। सीवीसी के निष्कर्षाें पर आलोक वर्मा का गोपनीय जवाब कथित रूप से लीक होने पर नाराज न्यायालय ने कहा था कि वह जांच एजेंसी की गरिमा बनाए रखने के लिये एजेंसी के निदेशक के जवाब को गोपनीय रखना चाहता था। उपमहानिरीक्षक सिन्हा ने १९ नवंबर को अपने आवेदन में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल, केन्द्रीय मंत्री हरिभाई पी चौधरी, सीवीसी के वी चौधरी पर भी सीबीआई के विशेष निदेशक राकेश अस्थाना के खिलाफ जांच में हस्तक्षेप करने के प्रयास करने के आरोप लगाए थे। दिल्ली हाईकोर्ट ने सीबीआई के निदेशक आलोक वर्मा और संयुक्त निदेशक एके शर्मा को एजेंसी के विशेष निदेशक राकेश अस्थाना के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी से संबंधित मामले की फाइल का केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) कार्यालय में निरीक्षण करने की अनुमति दे दी है। वर्मा के वकील ने कहा था कि अस्थाना की याचिका में उनके खिलाफ बदनीयती से आरोप लगाए गए हैं। अदालत ने सीबीआई को अस्थाना के खिलाफ कार्रवाई के संबंध में यथास्थिति बरकरार रखने के निर्देश देने वाले अपने आदेश की अवधि ७ दिसंबर तक बढ़ा दी। गौरतलब है कि हवाला और मनी लॉन्ड्रिंग के मामलों में मीट कारोबारी मोईन क़ुरैशी को क्लीनचिट देने में कथित तौर पर घूस लेने के आरोप में सीबीआई ने अपने ही विशेष निदेशक राकेश अस्थाना के खिलाफ एफआईआर दर्ज की थी। अस्थाना पर आरोप है कि उन्होंने मोईन क़ुरैशी मामले में हैदराबाद के एक व्यापारी से दो बिचौलियों के माध्यम से ५ करोड़ रुपये की रिश्वत मांगी थी। राकेश अस्थाना ने सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा पर ही इस मामले में आरोपी को बचाने के लिए दो करोड़ रुपये की घूस लेने का आरोप लगाया था। दोनों अफसरों के बीच मचा घमासान सार्वजनिक हो गया तो केंद्र सरकार ने दोनों अधिकारियों को छुट्टी पर भेज दिया था। साथ ही अस्थाना के खिलाफ जांच कर रहे १३ सीबीआई अफसरों का भी तबादला कर दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने २६ अक्टूबर को केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) से कहा था कि सुप्रीम कोर्ट जज की निगरानी में वह निदेशक आलोक वर्मा के खिलाफ लगाए गए आरोपों की जांच २ हफ्ते में पूरी करे।

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