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क्या अयोध्या में --अयुध्य रहेगा? (लेखक- डॉक्टर अरविन्द जैन)

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ज्वर के रोगी को बुखार उतरने के बाद भूख नहीं लगती या अग्निमांध होता हैं तब उसकी भूख बढ़ाने पहले हल्का खाना जैसे धान की लाई,मुरमुरा, मखाने देते हैं जिससे उसकी अग्नि धीरे धीरे प्रज्वलित होती हैं। जैसे आग की चिंगारी को प्रज्वलित करने घास के तिनके, कागज़ आदि ढेर लगाकर धीरे धीरे फूंकते हैं जिससे वह चिनगारी आग को पकड़ कर विशाल रूप हो जाती हैं। उससे सब कुछ जलाया जा सकता हैं। और किसी को भस्मक रोग होता हैं तो उसे जितना भी खिलाओ वह खाता जाता हैं। भूख शांत नहीं होती हैं। और यदि ज्वलनशील पदार्थ हो तो आग जल्दी पकड़ लेती हैं। और यदि गीली लकड़ी हो तो बहुत देर लगती हैं और यदि दो गीली लकड़ी धीरे धीरे जलती हैं और बाद में आग पकड़ लेती हैं, और यदि उनको अलग कर दो तो धुआँती रहती हैं। अज़ब दास्ताँ हैं इन रिश्तेदारियों की, मिले तो जले और बिछुड़े तो धुंआ दे। अयोध्या में क्या युध्य की तैयारी शुरू होने वाली हैं। इसका दोष नेताओं के साथ भीड़ का यानि भीड़तंत्र का होना यह इंगित करता हैं की वहां कुछ न कुछ अनिष्ट होने की संभावना हैं। इस भीड़ को ले जाने का मकसद, भीड़ कभी नियंत्रण में नहीं होती हैं और उसका श्रेय उनको होता हैं जो इस भीड़ का नेता हैं और जब कोई किसी मकसद को लेकर चलता हैं तब उसके अपने तर्क होते हैं। तर्क अनंत होते हैं और राजनीती में विवाद का होना अनिवार्य हैं। जब कोई चूहा किसी बिल्ली को आँख दिखाता हैं तो इसका मतलब चूहे का बिल नजदीक हैं। जब कोई नेता किसी उद्देश्य को लेकर समूह में चल रहा हैं तो इसका मतलब क्या हो सकता हैं ?यानि शासन और सत्ता उसके साथ हैं। कारण वह भी उनका उद्देश्य पूर्ण करने को कार्यरत हैं चाहे प्रत्यक्ष्य या प्रतक्ष्य में। अयोध्या शब्द स्वयं कहता हैं की मुझे युध्य से विहीन करो। युध्य प्रायः होते ही हैं पर अ-युध्य की ओर कोई नहीं जाता, और यदि युध्य भीतर हो तो वह विकास की ओर तो वह विकास का सूचक हो सकता हैं, किन्तु जो जंग बाहर छेड़ी गयी हैं और जिसमे लाखों लाख स्वाहा होने को हैं उसे कोई सर झुकाये कैसे मान सकता हैं अ युध्य यानि अहिंसा। युध्य की भयावहतः किसने नहीं जानी। समझो युध्य का अंत कितना दर्दीला होता हैं। देखो कितनों का सुहाग उजड़ेगा, बच्चे अनाथ होंगे बीमारियां फैलेंगी, अपंगो अपाहिजों की संख्या बढ़ेगी, समाज आतंकित /भयभीत हैं इस समय मनुज का एक दूसरे पर से भी विश्वास उठ गया हैं, इस करते मनुष्य नहीं कलंकित होगा। यह अयोध्या ने सबसे पहले अहिंसा का प्रचलन शुरू किया कारण हमेशा युध्य व्यक्तिगत बनकर सामाजिक रूप धारण करता हैं। युध्य में निरीह /निर्दोष मारे जाते हैं और धूर्त /शैतान बच जाते हैं। मंदिर निर्माण हो अवश्य हो पर बने राजी बाजी से, जिसमे हिंसा का प्रादुर्भाव होगा उसमे शांति का निवास असंभव। क्या कभी किसी ने श्मशान गृह /कब्रिस्तान में शांति देखी हैं हाँ उस शांति से किसी ने कभी पाठ सीखा, अयोध्या वह स्थान हैं जहाँ से अहिंसा का उद्गम हुआ। जानने के लिए इतिहास के पन्नों को झाँक कर देखा होता तो यह नौबत ना आयी होती। इस भूमि में नाभिराजा के पुत्र आदिनाथ ने राज्य किया। राजपाट त्याग कर आत्मकल्याण की ओर गए। राजपाट भरत और बाहुवली को सौप कर गए। भरत को चक्रवर्ती बनना था, बाहुवली ने भरत की अधीनता नहीं स्वीकारी। दोनों तरफ से युध्य की घोषणा हुई, मंत्रियों के विमर्श के बाद निर्णय हुआ युध्य दोनों के बीच का हैं तो इसमें नरसंहार की क्या जरुरत। दोनों में युध्य हुआ, बाहुवली जीत कर भी हारे और भरत हारकर जीते पर किसके लिए लड़े। बाहुवली ने निरोहों की रक्षा के लिए अ-युध्य संस्कृति को जन्म दिया। अहिंसा का उद्घोष किया। क्या इस मानसिकता से मंदिर का निर्माण किया जा सकता हैं। संसार में ऐसी कोई समस्या नहीं होती जिसका समाधान न हो, मात्र एक दूसरों के भावों का आदर करना सीखो। "ही" एकांतवाचक और युध्य को ललकारने वाला हैं जैसे मंदिर "ही" बनेगा ! क्या अभी तक बन पाया या बन पायेगा ?कभी नहीं बनेगा। यदि "भी" शब्द का उपयोग करो तो पूरी पूरी संभावना हैं की मंदिर भी बनेगा, मस्जिद भी बनेगी और अखाडा को भी जमीन दी जाएगी। एक बार दोनों पक्ष "भी" का उपयोग करके देखे। पक्का हैं एक पक्ष भी को स्वीकार कर अपना हक़ दे देगा। पर यही ही का उपयोग किया गया तो मानकर चलो मंदिर निर्माण एक राजनैतिक चाल हैं न मंदिर बनाना हैं और न विवाद शांत करना हैं। इसका जिन्दा रहना चुनावी सरगरमी और सत्ता में बने रहने का बहुत बड़ा हथियार हैं और रहेगा। जैसा साक्षी महाराज ने एक कहा की जामा मस्जिद की सीढ़ियों की खुदाई करो तो वह मंदिर निकलेगा। इसका सबूत अयोध्या में भी करके देखो ऐसा न हो की वहां कोई तीसरी चीज़ निकल आये! भूगर्भ में बहुत ऐसी अनोखी धरोहर छिपी पडी हैं की उसको स्वीकारना बहुत कठिन होगा आगामी समय बहुत संकटग्रस्त हो जाये। क्या सरकार की शह पर यह कूंच मार्च निकाला गया हैं ?क्या किसी न किसी को इसके निर्माण का श्रेय देकर लक्ष्य प्राप्त करना हैं ?यदि इस समय हठधर्मिता और हठवादिता का प्रदर्शन हुआ तो क्या कभी भी अप्रिय स्थिति किसके लिए अशुभकारी होगी। क्या देश कम समस्याओं से जूझ रहा हैं ?क्या इसमें अन्य संस्थाओं के अनुषांगिक संगठनो का मंतव्य पूरा होगा ? निर्माण होना चाहिए, न्यायालय के निर्णय के अनुसार या शासन की किसी अन्य प्रक्रिया के अनुसार। यदि किसी की भी साफ़ होगी तभी निर्माण संभव हैं अन्यथा युध्य की स्थिति निर्मित होना सम्भावी हैं। क्या अयोध्या में अ युध्य से मंदिर निर्माण नहीं होना चाहिए, ? क्या युध्य से किया गया निर्माण कितना किसको हितकारी होगा ? ये सब बातें भविष्य के गर्भ में छिपी हैं पर वर्तमान को देखकर भविष्य का आकलन किया जा सकता हैं। !!

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