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रसातल में राजनीति : धन्यवाद..... आपने हनुमान जी की जाति बताई......? (लेखक- ओमप्रकाश मेहता)

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एक पुरातन उपदेशात्मक पंक्तियों में कहा गया है- ‘‘जात न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान’’, अब उत्तरप्रदेश के साधु-संत वेषधारी मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ जी ने इस पुरातन उपदेशात्मक पंक्तियों को झुठला दिया है, क्योंकि इस संत वेषधारी राजनेता ने अपने ज्ञान के आधार पर बता दिया है कि त्रेतायुग के भगवान राम के अनन्य भक्त हनुमान जी तो वनवासी दलित है, चाहे गोस्वामी तुलसीदास जी ने हनुमान चालीसा लिखते समय उन्हें ‘‘कांधे मूंज जनोई साजे’’ बता दिया हो? माननीय योगी आदित्य नाथा जी को इस नई शोध के लिए बहुत-बहुत बधाई व पूरे रामभक्तों की ओर से आभार व धन्यवाद। यद्यपि मेरा अपने भाव व्यक्त करने का लहजा व्यंग्यात्मक है, जिसे परिहास की श्रेणी में रखा जा सकता है, किंतु महंत आदित्य नाथ जी ने अपनी राजनीति के अनुकूल यह शोध स्पष्ट करके करोड़ों रामभक्तों की भावना को ठेंस जरूर पहुंचाई और साथ ही यह भी स्पष्ट कर दिया कि अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए एक संत वैषधारी राजनेता किस स्तर तक जा सकता है? एक ओर जहां आदित्य नाथ जी की पार्टी भगवान राम के मंदिर के नाम पर अपनी केन्द्र की गद्दी बरकरार रखना चाहती है, वही दूसरी ओर उन्हीं आराध्य राम के अनन्य प्रथम भक्त हनुमान जी को भी जातिवादी राजनीति में घसीटने का प्रयास कर रही है? यदि वनवासी दलित है तो फिर चैदह वर्ष वन में गुजारने वाले भगवान राम किस जाति के हुए? फिर लगे हाथ उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ जी को यह भी बता देना चाहिये था कि वे दलितों को जिन तीन श्रेणियों में बांटने जा रहे है, उनमें से हनुमान जी कौन सी श्रेणी के दलित है, दलित, महादलित या अतिदलित? खैर, यह तो हुई उस शख्स के राजनीतिक स्तर की चर्चा जो प्रधानमंत्री के बाद स्टाॅर प्रचारकों में दूसरे क्रम पर है, और देश की राजनीति को पाताल लोक में ले जाने का वाहक है, किंतु इसमें महंत आदित्य नाथ को मैं विशेष दोषी इसलिए नहीं मानता क्योंकि राजनीति की इस मैली गंगा की गंगौत्री (गोमुख) तो और भी ऊँचाई पर है, जहां से जाति, धर्म और सम्प्रदाय की राजनीति का उद्गम हुआ। योगी जी ने तो सिर्फ उन ‘‘महाजन’’ के पद चिन्हों पर चलने का प्रयास भर किया है? क्योंकि आज की राजनीति किसी सिद्धांत या स्तर पर न ही बल्कि जाति, धर्म, सम्प्रदाय, गौत्र और जनैऊ पर आकर ठहर गई है, इसी कारण अब तो शीर्ष नेताओं को दूसरों से छुपकर मंदिर या अन्य आराधना स्थल तक जाना पड़ रहा है। देखिये, पिछले कुछ ही सालों में हमारी राजनीति की दिशा कितनी बदल दी गई, अब न विकास की बातें, न जन कल्याण या जनहित के वादे और न पंचवर्षीय योजना जैसी कोई साबधिक विकास का परिदृष्य। यद्यपि चुनाव के समय घोषणा-पत्र या संकल्प पत्र अवश्य जारी होते है, जिन्हें राजनीतिक स्वार्थपूर्ति के बाद ‘‘जुमलों’’ में बदल दिया जाता है, किंतु हमारे कलियुगी कर्णधारों की सोच सिर्फ और सिर्फ यही हो गई है कि धार्मिक या साम्प्रदायिक भावनात्मक प्रवचनों (भाषणों) से ही मतदाता प्रभावित होता है और जिस क्षेत्र में जिस देवता के आराधक वोटर ज्यादा हो उन्हीं देवता के बारे में शौधात्मक भावना प्रकट की जाए, चाहे वह नैतिक व धार्मिक आधार पर असत्य ही क्यों न हो? जिससे धार्मिक आधार पर वोटों की बरसात हो सके। अब जहां तक मुस्लिम वोटर्स का सवाल है, उनके आराधना स्थल मस्जिद या मजारें होती है और उन पर जातिगत राजनीति कि नहीं जा सकती, किंतु हिन्दू मतदाताओं के तो तैंतीस करोड़ देवता है, हर हिन्दू मतदाता किसी न किसी देवता का भक्त है, इसलिए आधुनिक राजनीतिक दलों के लिए हिन्दू देवताओं की कोई कमी नहीं है, भगवान राम, श्री कृष्ण आदि की जातियाँ तो सर्वज्ञात है, इसलिए इन पर राजनीति की नहीं जा सकती, इसलिए अब हनुमान जी जैसे देवता की बारी आ गई, अब आगे देखिये कौन से देवता का नम्बर लगता है?

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