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बच्चे को गैजेट की आदत न डालें

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बच्चों को कई बार अनजाने में अभिभावक ऐसी आदत लगा देते हैं जो बाद में उनके लिए ही परेशानी बन जाती है। आमतौर पर अभिभावक अपना कोई काम करने, किसी मेहमान के आने पर बच्चों को व्यस्त रखने के लिए या तो उन्हें टीवी के पास बैठा देते हैं या मोबाइल पकड़ा देते हैं। अभिभावक ऐसा इसलिए करते हैं ताकि बच्चा कुछ देर के लिए उस गैजेट में व्यस्त हो जाए और वे अपना काम कर सकें। वहीं परेशानी तब बढ़ती है जब आप चाहते हैं कि वह गैजेट छोड़ कर आपके साथ समय बिताए और वह ऐसा करने को तैयार नहीं होता। यहीं से शुरु होती है असली परेशानी। गेमिंग की लत की वजह से लोग अपने प्रियजनों से दूर होने लगते हैं और इसके अलावा इस लत की वजह से नींद और शारीरिक गतिविधियों में कमी की समस्या भी उत्पन्न होने लगती है। ऐसे लक्षणों पर आमतौर पर कम से कम 12 महीने तक निगाह रखनी चाहिए।धीरे धीरे, ऐसा व्यक्ति परिवार के सदस्यों से बातचीत कम कर देता है, क्योंकि उनमें से हरेक किसी न किसी स्क्रीन पर आंखें लगाये बैठे रहते हैं या किसी और उलझन में होते हैं। मनोचिकित्सकों के अनुसार इस स्थिति से बाहर निकालने के लिए 6 से 8 सप्ताह की थेरेपी चाहिए होती है। इसके तहत, उन्हें सिखाया जाता है कि गेम खेलने, असुविधा का सामना करने और अन्य स्वस्थ मनोरंजन के साधनों पर ध्यान केंद्रित करने के लिए कैसे खुद को संभालना है।अकेले बच्चे को ही ठीक नहीं किया जा सकता। आज माता-पिता के पास अपने बच्चों के साथ बैठने या बात करने का समय ही नहीं है। बच्चों को इस तरह के व्यसनों से रोकने के लिए पर्याप्त समय और ध्यान देना महत्वपूर्ण है। समय की कमी को उपहारों से पूरा नहीं किया जा सकता, और न ही ऐसा करना चाहिए। कई माता-पिता को बच्चे की इस बीमारी का तब पता चलता है जब उसकी पढ़ाई में भारी गिरावट आती है, पेशेवर जीवन में विफलता होने लगती है या सामाजिक अलगाव दिखाई देने लगता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन(डब्ल्यूएचओ) ने हाल ही में मानसिक स्वास्थ्य विकार के रूप में डिजिटल और वीडियो गेमिंग को एक व्यसन माना है। 05जनवरी ईएमएस फीचर

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