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सिफारिशों पर अमल नहीं संसदीय समिति का औचित्य

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नागरिक उड्डयन मंत्रालय से जुड़ी संसदीय समिति ने मनमाने हवाई किरायों पर लगाम लगाने संबंधी अपनी सिफ़ारिश को नज़रअंदाज़ किए जाने पर सख्त नाराजगी जताई है। समिति की दूसरी रिपोर्ट पिछले सप्ताह संसद के पटल पर रखी गई। इस समिति ने अपनी पहली रिपोर्ट इस साल के शुरुआत में संसद में पेश की थी जिसमें त्योहारों और महत्वपूर्ण दिनों पर हवाई किरायों को 10 गुना तक बढाने पर आपत्ति जताते हुए सरकार से इस पर काबू करने की सिफ़ारिश की थी। तृणमूल कांग्रेस सांसद डेरेक ओ’ब्रायन की अध्यक्षता वाली संसदीय समिति का मानना था कि सरकार को हर रूट के लिए अधिकतम किराए की सीमा निर्धारित करनी चाहिए क्योंकि विमानन कंपनियों को मनमाना लाभ कमाने की छूट नही दी जा सकती। सरकार को आम नागरिकों के प्रति अपनी जवाबदेही के तहत हवाई यात्रियों को शोषण से बचाना चाहिए। समिति ने निजी कंपनियों द्वारा सामान, खाने और सीट बुक करने जैसी निशुल्क सुविधाओं पर ऊंचे दामों पर बेचने पर भी आपत्ति की थी। समिति ने एयर टरबाइन फ्यूल (एटीएफ) के दाम घटने का फायदा हवाई यात्रियों को न दिए जाने पर नाराजगी जताई थी। सरकार को संसदीय समिति की रिपोर्ट पर क्या कार्रवाई की गई, यह समिति को बताना होता है। लेकिन इस मामले में अधिकतर सिफ़ारिशों के जवाब में 29 अगस्त को भेजी गई एक्शन टेकन रिपोर्ट (एटीआर) में नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने मात्र ‘ड्यूली नोटेड’ (संज्ञान ले लिया गया है) लिख कर वापस भेज दिया। सरकार का कहना था कि 1994 के एयर कारपोरेशन एक्ट के खत्म हो जाने के बाद अब हवाई किराए निर्धारित करने में उसकी बहुत सीमित भूमिका रह गई है। वह न तो इन्हें नियंत्रित कर सकती है और न ही इनका अनुमोदन। हवाई कंपनियां वैसे भी यात्रा से 90 दिन या 60 दिन पहले बुकिंग करने वालों से रियायती किराया ही वसूल रही हैं। इसी तरह 2013 के एयर ट्रांस्पोर्ट सरकुलर के जरिए भोजन, सामान और सीट चुनने जैसी सभी सुविधाएं किराए से अलग की थीं। अब सरकार इसमें कोई दख़ल नहीं दे सकती। अगर सरकार या सम्बंधित मंत्रालय संसदीय समितियों की सिफारिशों पर अमल ही न करें तो संसदीय समितियों का औचित्य ही क्या रह जाता है। मात्र ‘डय़ूली नोटेड’ लिख कर छुट्टी पा लेना क्या सचमुच संसदीय समिति का निरादर करना नहीं है? जहाँ तक नागरिक उड्डयन मंत्रालय वाले मामले में सरकार की सफाई का सवाल है, वह संसदीय समिति को अज्ञानी ठहराने जैसी है। क्योंकि जो कुछ वह कह रही है, वह पहले ही उसने संसदीय समिति को क्यों नहीं बताया? अगर सरकार की दलीलें संसदीय समिति के संज्ञान में होतीं तो वह अभिमत उनके आधार पर ही निर्धारित करती। इसे भले ही संसदीय समिति से तथ्य छुपाना भले न कहा जाये लेकिन अर्थपूर्ण संवाद का अभाव तो कहा ही जायेगा। हमारा मानना है कि हमारी संसदीय प्रणाली को प्रभावी ढंग से संचालित किया जाना अत्यावश्यक है और इसमें सभी को अपने दायित्वों का निर्वहन ईमानदारी से तत्परतापूर्वक करना चाहिए।

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