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प्री-स्कूल शिक्षा बच्चों को तैयार करती है प्राथमिक शिक्षा के लिए

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नन्हे बच्चों को प्री-स्कूल शिक्षा प्राथमिक शिक्षा के लिए तैयार करती है। कामकाजी माताओं के लिए भी यह किसी सहारे से कम नहीं है। यह एक सेतु की तरह काम करती है। इसका एक उदाहरण है दक्षिण-पूर्व वाशिंगटन डीसी में स्थित टर्नर प्राथमिक विद्यालय। इस विद्यालय में पांच साल तक की उम्र के बच्चे बेहद सक्रिय हैं। उत्सुकता से स्कूल के लिए तैयार होते हैं। टीचर की बात ध्यान से सुनते हैं। वजह है प्रीस्कूल शिक्षा। दरअसल इस प्राथमिक विद्यालय के बच्चों को उनकी प्रीस्कूलिंग के दौरान कराई गई गतिविधियों से मदद मिल रही है। स्कूल के प्रधानाचार्य एरिक बेथेल का कहना है कि स्कूल का अकादमिक परिणाम काफी बेहतर है। उनके स्कूल में प्रीस्कूल बच्चों को तीन साल की उम्र से पढ़ना सिखाया जा रहा है। फ्रांस और डेनमार्क में भी प्रीस्कूली शिक्षा पर फोकस बढ़ रहा है।अमीर देशों में प्री-स्कूल शिक्षा में लोगों की दिलचस्पी ज्यादा बढ़ रही है। यही वजह है कि यह विषय घर से निकलकर बाहर और संस्थानों तक पहुंच चुका है। तीन से पांच साल के बच्चों का नामांकन में तेजी से वृद्धि हो रही है। 2005 में यह संख्या 75 प्रतिशत थी, 2016 में 85 फीसदी देखी गई। शंघाई के एक शहर में फॉर्चून किंडरगार्टन में भी बच्चे काफी सक्रिय हैं। खेल संबंधी गतिविधियों के साथ उनका स्कूल खत्म होता है। फॉर्चून शंघाई का सबसे बहेतर किंडरगार्टन माना जाता है। 18 महीने से 6 साल के बच्चे यहां आते हैं। अभिभावकों को सरकार से सब्सिडी मिलती है, लेकिन बाकियों के लिए यह काफी महंगा है (15,000 युआन प्रतिमाह)। इस स्कूल में पांच से छह साल के बच्चें को अलग-अलग भाषाएं पढ़ाई जाती हैं। यहां तक कि दार्शनशास्त्र की क्लास भी लगती हैं। डेनिश डाइल्ड केयर सेंटर्स में औपचारिक शिक्षा की बजाय खेलकूद पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। शंघाई में छह साल की उम्र में बच्चों की जब तक पढ़ाई शुरू नहीं होती, प्री-स्कूल में वह पढ़ते नहीं है। लेकिन प्री-स्कूल के बाद वह स्कूल शिक्षा में तेजी से सीखते हैं।

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