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आखिर देश में कब तक होते रहेंगें रेल हादसे?

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एक फरवरी को संसद में बजट पेश करते हुये वित्त मंत्री का प्रभार भी संभाल रहे रेल मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि भारतीय रेल के लिए वर्ष 2018-19 अब तक सबसे सुरक्षित साल रहा है और बड़ी लाइनों वाले नेटवर्क पर सभी मानवरहित लेवल क्रॉसिंग को समाप्त कर दिया गया है। अपने पहले बजट भाषण में गोयल ने कहा कि आगामी वित्त वर्ष के लिए रेलवे के लिए 1.58 करोड़ रुपए का पूंजीगत व्यय कार्यक्रम है, जो अब तक की सर्वाधिक राशि है। स्वेदश में विकसित सेमी हाई-स्पीड वंदे भारत एक्सिप्रेस का परिचालन शुरू होने से भारतीय यात्रियों को तेज रफ्तार, बेहतरीन सेवा एवं सुरक्षा के साथ विश्वस्तरीय अनुभव होगा। संसद में जहां रेल मंत्री रेलवे के सबसे सुरक्षित साल बीतने की बात कर रहे थे उसके दो दिन बाद ही बिहार के हाजीपुर में रविवार सुबह एक बड़ा रेल हादसा हो गया। इस रेल हादसे में जोगबनी से नई दिल्ली जा रही आनंद बिहार-राधिकापुर सीमांचल एक्सप्रेस की 11 बोगियां पटरी से उतर गईं। इस हादसे में 7 लोगों की मौत हो गई, जबकि 30 यात्री घायल हुए हैं। हादसा इतना भयानक था कि इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि ट्रेन के डिब्बे एक के ऊपर एक चढ़ गए थे। यात्रियों ने बताया जिस समय यह हादसा हुआ उस समय ट्रेन में अधिकांश यात्री सो रहे थे। तभी अचानक धमाके की आवाज आई। नींद खुली तो देखा कि यात्री एक के ऊपर एक इधर-उधर गिरे पड़े हैं। केंद्र में मोदी सरकार आने के बाद साढ़े चार साल में अब तक 14 बड़े रेल हादसे हो चुके हैं जिनमें 200 से अधिक यात्रियों की मौत हो गयी थी। बिहार के हाजीपुर में रविवार सुबह हुए रेल हादसे के साथ ही रेलवे सुरक्षा को लेकर एक बार फिर से बड़े सवाल खड़े हो गए हैं। लेकिन मूल प्रश्न फिर भी अपनी जगह बना हुआ है कि आखिर रेल दुर्घटनाएं रुकेगी कैसे? क्या सरकार केवल कारण बताकर वह अपनी जिम्मेदारी से हाथ झटक सकती है ? लगातार हो रही रेल दुर्घटनाओं के कुछ कारण दिखाई देते हैं, मसलन कमजोर अधोसंरचना, मानवीय भूलें, पटरियों का सुचारू रखरखाव न होना आदि। हैरत यह देखकर होती है कि तकनीकी विकास का दावा करने के बावजूद गर्मी में ट्रैक का फैलना और सर्दियों में संकुचन होना, रेलवे के इंजीनियरिंग विभाग के लिए बड़ी समस्या है। अगर तकनीकी पहलू सुधारने की बात की जाए तो धन की कमी का रोना रोया जाता है। भारतीय रेल में सुधार की तमाम सिफारिशें लंबे समय से फाइलों में धूल फांक रही हैं और रेल हादसे बदस्तूर जारी हैं। धन और कर्मचारियों की कमी रेल सुरक्षा की राह का सबसे बड़ा रोड़ा बन गया है। गत वर्ष कानपुर में हुए रेल हादसे ने भारतीय रेल और इसके डिब्बों की लचर हालत का खुलासा कर दिया था। रेलवे ने सुरक्षा के लिहाज से इंटीग्रल कोच फैक्ट्री में बने डिब्बों को एलएचबी डिब्बों से बदलने की योजना बनाई थी। लेकिन यह गति इतनी धीमी है कि इसमें रेलवे को कम से कम 30 साल लग जाएंगे। एलएचबी डिब्बे फिलहाल राजधानी और शताब्दी एक्सप्रेस जैसी ट्रेनों में ही लगे हैं। सुरक्षा उपायों की वजह से हादसे की स्थिति में ऐसे डिब्बे एक दूसरे के ऊपर नहीं चढ़ते। केंद्र सरकार और रेल मंत्रालय ने अतीत में होने वाले हादसों से कोई खास सबक नहीं लिया है। ट्रेनों में यात्री सुरक्षा के तमाम दावों के बावजूद हकीकत इसके उलट है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बीते साल रेलवे नेटवर्क को बेहतर बनाने की महात्वाकांक्षी योजना के तहत पांच साल के दौरान साढ़े आठ खरब रुपए के निवेश का एलान किया था। बावजूद इसके ट्रेन हादसे थमने की बजाय बढ़ते ही जा रहे हैं। रेलवे में सुरक्षा का कामकाज देखने वाले कर्मचारियों के 1 लाख 30 हजार पद खाली पड़े हैं। नतीजतन बाकी कर्मचारियों पर काम का भारी दबाव है। इससे भी रेल हादसे बढ़े हैं। रेल मंत्रालय ट्रेनों और पटरियों की सुरक्षा बढ़ाने के चाहे जितने उपाय कर ले, कर्मचारियों की भारी कमी की वजह से उनको जमीनी स्तर पर लागू करना संभव नहीं होगा। इसके चलते हादसों पर अंकुश नहीं लगाया जा सकेगा। भारत में 2018 में छोटे-बड़े 40 रेल हादसे हुये थे जबकि 2017 में 78 हादसे। 2016 में 80 रेल हादसे 2015 में 69 रेल हादसे हुए थे। 2014-15 में 131 रेल हादसे हुए और इसमें 168 लोग मारे गए। 2013-14 में 117 ट्रेन हादसे हुए और इसमें 103 लोग मारे गए थे। 2011-12 में जो 115 रेल दुर्घटनाएं हुर्इं। 2014-2015 में 60 फीसदी रेल दुर्घटना ट्रेनों के पटरी से उतरने के कारण हुई थी। दुनिया के सबसे बड़े रेल नेटवर्क में से एक भारतीय रेल नेटवर्क में हर रोज सवा दो करोड़ से भी ज्यादा यात्री सफर करते हैं जबकि 87 लाख टन के आसपास सामान ढ़ोया जाता है। कुल 64,600 किलोमीटर रूट के ट्रैक पर जरा-सी चूक लाखों लोगों की जान को जोखिम में डाल सकती है। ऐसे में इन पटरियों पर यात्रियों और इनके आसपास से गुजरने वालों की सुरक्षा पर खास ध्यान देने की विशेष जरूरत है। लेकिन यह हो नहीं पाता और यही वजह है कि हर साल हादसों का सामना करना पड़ता है। रेल विभाग में होने वाले हादसों पर अब तक के मनन-मंथन के बाद यह पाया गया है कि 80 फीसद दुर्घटनाएं मानवीय भूल के कारण होती हैं। हाल ही में पेश किये गये बजट में सरकार ने नई लाइनों के निर्माण के लिए 7255 करोड़ रुपए की निधि आवंटित की गई है, 2200 करोड़ रुपए आमान परिवर्तन, दोहरीकरण के लिए 700 करोड़ रुपए, रॉलिंग स्टॉक के लिए 6114.82 करोड़ रुपए और सिग्नल एवं दूरसंचार के लिए 1,750 करोड़ रुपए आवंटित किए गए हैं। जो एक सराहनीय कदम है। रेल मंत्री ने कहा कि रेलवे का नियोजित व्यय वर्ष 2013-14 के स्तर से 148 प्रतिशत अधिक हो गया है। यात्री सुविधाओं के विकास के लिए कुल 3422 करोड़ रुपए आवंटित किए गए हैं जो रेल उपभोक्ताओं की सुविधा के लिए करीब 1000 करोड़ रुपए का अतिरिक्त व्यय है। भारत में जब भी कोई रेल दुर्घटना होती है मुआवजे की घोषणा कर उसे भूला दिया जाता है। हमें इस प्रवृत्ति से बाहर आना होगा। रेलवे सुरक्षा के कई पहलू होते हैं लेकिन प्रबंधन के स्तर पर सभी पहलू जुड़ेे रहते हैं। होता यह है कि रेलवे विभाग रेल सेवाओं में तो वृद्धि कर देता है परन्तु सुरक्षा का मामला उपेक्षित रह जाता है। रेलवे सुरक्षा और सेवाओं के मध्य समुचित संतुलन बनाए जाने की सख्त जरुरत है। आज हम देश में बुलेट ट्रेन चलाने की बात कर रहें हैं और आये दिन होने वाली रेल दुर्घटनाओं को रोक पाने में सफल नहीं हो पा रहे हैं तो ऐसे में बुलेट ट्रेन चलाने का सपना कैसे पूरा हो पायेगा। सरकार को सर्वप्रथम भारतीय रेल की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता प्रदान करनी होगी। अन्यथा रेल दुर्घटनाओं का सिलसिला यूं ही चलता रहेगा व लोग आये दिन किसी और रेल दुर्घटना पर चर्चा करते रहेगें।

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