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बढ़ती आबादी और बच्चों के अधिकार

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भारत में एक वर्ग ऐसा है जो शिद्दत से मानता है कि सरकारी रीति-नीति और नियम-कायदों के कारण तथा कुछ वर्गों द्वारा अपने धर्मगुरुओं के आदेशों, सामाजिक परम्पराओं और रणनीतिक राजनैतिक उद्देश्यों से प्रेरित होकर ज्यादा से ज्यादा संतानें पैदा करके अपनी संख्या बढ़ाने के लिए के जाने वाली परिवार वृद्धि ने देश में धार्मिक आधार पर आबादी के असंतुलन का गम्भीर खतरा उत्पन्न कर दिया है। इस धारणा की पुष्टि इस बात से होती है कि इसी असंतुलन को आधार बनाकर और संतुलन हिन्दुओं के पक्ष में बनाने की दलील देकर कुछ भगवाधारी सांसदों और कुछ धर्मगुरुओं के सुर में सुर मिलाते हुए आंध प्रदेश के मुख्यमंत्री चन्द्रबाबू नायडू भी अब 3-3, 4-4 बच्चे पैदा करने के लिए प्रोत्साहन देने की बात करने लगे हैं। इसमें कोई शक नहीं कि भारत दुनिया की सर्वाधिक आबादी वाला दूसरे नम्बर का देश है। इसके कारण कई समस्याएं हैं, तो एक बड़ा लाभ डेमोग्राफिक कोशेण्ट का भी है, जिसका कारण भारत की आबादी में 35 करोड़ युवाओं का होना है। इतनी बड़ी संख्या में अगर युवकों को काम पर लगाया जा सके तो देश की अर्थव्यवस्था में चार चांद लग सकते हैं। यह देखना कई सवालों को जन्म देता है कि ज्यादा आबादी एशिया में ही बढ़ रही है। यह आंकड़े सामने आये हैं कि नये साल के पहले दिन भी दुनिया भर में 395, 000 बच्चों ने जन्म लिया। इसमें भारत में इस दिन जन्म लेने वाले बच्चों की संख्या 70,000 है, जो कि दुनिया के अन्य देशों के मुकाबले सर्वाधिक है। संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (यूनिसेफ) का अनुमान है कि इनमें से आधे से ज्यादा बच्चे भारत, चीन, पाकिस्तान, संयुक्त राज्य अमेरिका और बांग्लादेश सहित आठ देशों में जन्मे हैं। इस दिन भारत में कुल 69,944 बच्चों का जन्म होने अनुमान लगाया गया है। इसके बाद चीन में 44,940 बच्चे, नाइजीरिया में 25,685 बच्चे, पाकिस्तान में 15, 112 बच्चे, इंडोनेशिया में 13, 256 बच्चे, अमेरिका में 11,086 बच्चे, डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो 10,053 बच्चे और बांग्लादेश में 8,428 बच्चों का जन्म हुआ। दरअसल, इन आंकड़ों का हवाला देते हुए यूनिसेफ ने सभी राष्ट्रों से प्रत्येक नवजात बच्चे के स्वस्थ और जीवित रहने सहित अन्य मानवाधिकारों को सुनिश्चित करने को कहा है। विश्व में बढ़ती आबादी से कहीं ज्यादा तेजी से आर्थिक विषमता बढ़ रही है। गरीबी भी तेजी से बढ़ रही है। इसलिए यूनीसेफ की चिंता वाजिब ही है। क्योंकि भारत के कई देशों में कुपोषित बच्चे सबके लिए चिन्ता और शर्मिन्दगी का कारण बने हुए हैं। इसलिए बढ़ती आबादी पर वैश्विकस्तर पर विचार मंथन जरूरी है और ऐसी व्यवस्था करना भी जरूरी है कि बच्चे पैदा हों तो जीवित रहे, दीर्घायु हों और स्वस्थ भी रहें। साथ ही बेहतर परिस्थितियों में वे सम्मानजनक जीवन भी जी सकें। और ,यह सब उनका अधिकार भी होना चाहिए।

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