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मौसम के बिगड़ते मिजाज का नमूना बारिश, ओले और गर्मी

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हाल ही में दिल्ली-एनसीआर में जबर्दस्त बारिश के साथ ओले पड़े, जिससे सड़कें सफेद बर्फ की चादर से ढंकी हुई नजर आईं। लोगों को महसूस हुआ कि वो दिल्ली नहीं बल्कि कश्मीर या शिमला में वो बर्फवारी का लुत्फ ले रहे हैं। कहने को तो दिल्लीवालों ने इस बदले हुए मौसम का जमकर आनंद उठाया, लेकिन सही मायने में उन सभी के जेहन में एक सवाल अवश्य ही कौंध रहा था और वह यह कि आखिर दिल्ली जैसे शहर में इस कदर ओले और बारिश क्योंकर हो रही है? यह प्रकृति की तरह से कहीं किसी बड़ी अनहोनी का पूर्वसंकेतक तो नहीं है? वैसे भी ग्लोबल वार्मिंग और उससे होने वाली हानियों की भविष्यवाणियों से अच्छे खासे लोग चिंतित हैं। यह अलग बात है कि जिंन्हें चिंता करनी चाहिए और जो दिशा और दशा बदलने की जिम्मेदारी निभा सकते हैं वो पूरी तरह निश्चिंत नजर आते हैं। यही वजह है कि अमेरिका जैसे देश पर्यावरण संरक्षण संबंधी संधियों से खुद को अलग कर लेते हैं और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप तो साफ शब्दों में कहते देखे जाते हैं कि क्या पूरी जिम्मेदारी उन्हीं की है जो तमाम तरह के नुक्सान उठाते हुए भी उसे निभाते चले जाएं। बहरहाल जहां तक दिल्ली में भारी बारिश और ओले गिरने का सवाल है तो भारतीय मौसम विभाग ने स्पष्ट कर दिया है कि अलग-अलग दिशाओं से आने वाली हवाओं के मेल से दिल्ली-एनसीआर के मौसम का मिजाज बिगड़ा है! इसी कारण बारिश के साथ जमकर ओले बरसे हैं। यह तो सभी जानते हैं कि दक्षिण से चलने वाली हवाएं गर्म होती हैं और उनका संपर्क जब उत्तरी क्षेत्र की ठंडी हवाओं से होता है तो बादल बन कम दबाव वाले क्षेत्र में बारिश या ओले बरसाने पहुंच जाती हैं। इसलिए भी इस मौसम में बारिश होना या ओले पड़ना कोई अनोखी बात नहीं है। मौसम विज्ञानी भी यही मान रहे हैं कि बंगाल की खाड़ी और अरब सागर की तरफ से आने वाली हवाएं उत्तरी क्षेत्र के मैदानी इलाके से गुजर रही थीं, इस कारण आसमान में निचले स्तर पर बादल बने। ठंडी हवाएं एवं कम तापमान और पश्चिमी विक्षोभ के कारण उत्तरी भारत में बारिश के साथ ओले पड़े। दिल्ली से नजरें हटती हैं तो पाते हैं कि पहाड़ी इलाके जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में कई जगहों पर भारी बारिश और हिमपात होती दिखती है। जम्मू कश्मीर के पीर पंजाल की पहाड़ियों में तो रिकार्ड तोड़ हिमपात होने की बात कही गई है। मौसम विभाग के आंकड़े बता रहे हैं कि ऊंचे इलाकों में 70 सेंटीमीटर से ज्यादा की बर्फबारी हुई है। यह सब तो ठीक है, लेकिन दिल्ली-एनसीआर रहवासियों का तो यही सवाल है कि बारिश और ओले पड़ने के बावजूद आखिर ठंड क्यों महसूस नहीं हुई, आखिर क्या कारण है कि जिस तरह की ठंड जाड़ों की बारिश में महसूस की जाती रही है वह पूरी तरह गायब है। इसकी वजह भी हवा की बदली हुई दशा और दिशा को ही जिम्मेदार ठहराया जा रहा है, जबकि समझने वाली बात यह है कि जैसे-जैसे कंकरीट के कभी खत्म नहीं होने वाले जंगलात तैयार होते चले जा रहे हैं, वैसे-वैसे मौसम का मिजाज लगातार बिगड़ता चला जा रहा है। नदियां, तालाब, कुंए सूख रहे हैं, तापमान बढ़ता चला जा रहा है, रेगिस्तानों में रिकॉर्ड बारिश हो रही है, क्योंकि धरती को हरी चादर ओढ़ाने वाले वृक्ष बड़ी संख्या में काटकर पर्वतीय व पठारी इलाकों को समतल कर दिया गया है। जरुरत से ज्यादा जमीन के अंदर से पानी, तेल व अन्य खनिज पदार्थों को निकाला जा चुका है और बचे हुए को और तेजी से निकालने का काम भी युद्ध स्तर पर जारी है। जहां कभी घने, बियाबान जंगल हुआ करते थे। जो अपने अंदर जल, जड़ी-बूटी से लेकर बेशकीमती इमारती लकड़ी समेत अनमोल खजाने का भंडार हुआ करते थे अब वो सपाट मैदान में तब्दील हो चुके हैं। भूमिगत जल का स्तर लगातार गिर रहा है, नदियां या तो प्रदूषित हो रही हैं या फिर सूख चुकी हैं। बर्फीले पहाड़ पिघल रहे हैं और जतला रहे हैं कि ग्लोबल वॉर्मिंग अपने उरूज पर है, यदि अब भी इंसान नहीं चेता तो सब कुछ नष्टप्राय: हो जाएगा। इस पर भी हम निश्चिंत हैं क्योंकि भले ही प्रलय के संकेत वर्तमान में मिल रहे हों, लेकिन इसका अधिकतम खामियाजा तो आने वाली पीढ़ी को ही भुगतना है। फिर अभी से हम उस प्राकृतिक प्रलय की चिंता क्यों करें, जिसके रोकथाम के लिए हम मानवजाति को खासी परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। कुल मिलाकर भौतिक सुख प्राप्त करने की खातिर मनुष्य ने प्रकृति के संतुलन को बिगाड़कर रख दिया है और जब प्रकृति अपना संतुलन बनाएगी तो उसका खामियाजा सबसे ज्यादा इंसान को ही उठाना होगा। इसलिए कहा जा रहा है कि इससे पहले कि प्रकृति अपना भयावह रुप दिखाए प्रकृतिस्थ हो प्रकृति को संवारने की दिशा में आगे बढ़ना उचित होगा। बारिश, ओले और गर्मी मौसम के बिगड़ते मिजाज का संकेत है, जिसे समझने और फिर उसी के लिहाज से अपनी जीवनशैली को बदलने की आवश्यकता है। पेड़-पौधे लगाएं, नदियों के जल को प्रदूषित होने से बचाएं और सबसे बड़ी बात पृथ्वी के गर्भ को खाली करने वालों को रोकें, क्योंकि इससे प्रकृति का संतुलन बिगड़ रहा है। इसे रोकने की जिम्मेदारी सिर्फ सरकार या प्रशासन की नहीं बल्कि समस्त मानवजाति की है।

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