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अपनों की नाराजगी झेलते प्रधानमंत्री मोदी

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देश के गरीबों व असहायों को अपने हाल पर छोड़कर अब देश में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी पूरे मनोयोग से लोकसभा चुनाव पर केन्द्रीत हो गई है, अब वह देश के वोटर से चाहती है कि अगले तीन महीनें वह अपनी निजी समस्याएँ भूल जाएं और भाजपा को फिर से सत्तारूढ़ कराने में जुट जाए, यही नहीं अब तो भाजपा व प्रधानमंत्री ने भगवान राम को भी भुला दिया हैं और अपना पूरा ध्यान कांग्रेस की नई-नवेली नैत्री प्रियंका गांधी को बदनाम करने पर केन्द्रीत कर दिया है, भाजपा ने संघ व विश्व हिन्दू परिषद से भी कह दिया है कि वे राम मंदिर को भुलाकर भाजपा के नए चुनावी चक्रव्यूह में उसकी मद्द करें और आश्चर्य यह कि भाजपा के कथित संरक्षक राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख डाॅ. मोहनराव भागवत ने भाजपा व प्रधानमंत्री के आदेश को शिरोधार्य कर उसका पालन शुरू कर दिया है। आज पूरा देश सिर्फ एक सवाल देश के प्रधानमंत्री और सत्तारूढ़ दल के अध्यक्ष से पूछ रहा है कि जिन कथित भ्रष्टाचार के मामलों को लेकर प्रियंका के पति राबर्ड वाड्रा को घेरा जा रहा है, क्या ये भ्रष्टाचार के मामले वर्तमान केन्द्र सरकार के मौजूदा कार्यकाल के है? यदि ये दस-बीस साल पुराने है तो फिर इन पर जो कार्यवाही एन-चुनाव के पहले हो रही है, वह पिछले साढ़े चार साल में क्यों नहीं की गई? अभी प्रियंका के राजनीति में सक्रिय होने के बाद क्यों की गई? क्या प्रवर्तन निदेशालय को इन सब मामलों का पता नहीं था? केन्द्र के इस मामले में अचानक सक्रिय होने का एक मात्र कारण प्रियंका की मानसिक रूप से घेराबंदी है, जिससे कि वे पूरे मनोयोग से पूर्वी उत्तरप्रदेश की दी गई जिम्मेदारी पूरी नहीं कर पाएं। ......और अब तो हाल ही के घटनाक्रमों ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि सिर्फ सीबीआई का तोता ही केन्द्र के पींजरे में नहीं है, अब तो प्रवर्तन निदेशालय जैसे संवैधानिक संगठन भी केन्द्र सरकार के पींजरे में कैद है और ये अपने आका प्रधानमंत्री के निर्देश पर काम पूर्वाग्रह आधारित कार्यवाही को अंजाम देने को मजबूर है, पश्चिम बंगाल के कोलकता कमीश्नर वाली घटना ने यह उजागर कर दिया है। कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि भाजपाध्यक्ष व प्रधानमंत्री ने अब राम मंदिर के मुद्दे से किनारा कर प्रतिद्वन्दी दलों के नेताओं को लक्ष्य बनाकर चुनावी ‘प्लान’ तैयार कर लिया है, और उसी मार्ग पर चलना भी शुरू कर दिया है, यद्यपि इस बीच प्रियंका गांधी का यह कहना भी महत्व रखता है कि ‘‘पूरा विश्व जानता है कि यह सब क्यों किया जा रहा है’’ और वह अपने व्यक्तित्व के अनुरूप प्रतिदिन व्यक्तिगत गालियाँ सहकर भी पूरे मनोयोग से अपने लक्ष्य की ओर बढ़ रही है, करीब-करीब यही स्थिति भाजपा के दूसरे लक्ष्य ममता बैनर्जी की है, उसने जहां अपने प्रदेश में भाजपा की रैलियों व उनके नेताओं के उड़न खटोलों के उतरने पर अपने राज्य में सख्त प्रतिबंध लगा दिया है, वहीं वे अगले सप्ताह दिल्ली आकर वहां भी ‘हल्ला बोल’ का आयोजन करने वाली है, जिसमें दो दर्जन से अधिक प्रमुख प्रतिपक्षी दल व उनके नेता शिरकत करने वाले है। मोदी-अमित शाह की सबसे अहम् चिंता उत्तर प्रदेश की है, क्योंकि वे जानते है कि देश की सत्ता के सिंहासन तक पहुंचने का रास्ता उत्तर प्रदेश से ही गुजरता है, और कांग्रेस ने अपनी पार्टी के दो युवा व चुम्बकीय चेहरों प्रियंका और ज्योतिरादित्य सिंधिया को उत्तर प्रदेश की कमान थमा दी है, और इसी बात को लेकर सत्तारूढ़ दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष और प्रधानमंत्री जी काफी चिंतित है, फिर इन दोनों युवा चेहरों के अलावा युवा-भतीजें (माया-अखिलेश) का गठबंधन भी भाजपा के ‘अश्वमेघी यज्ञ’ के घोड़े की विजय-यात्रा में बाधक बन सकता है, इस लिए अमित-मोदी को कई मोर्चों पर एक साथ निगरानी रखनी पड़ रही है। यद्यपि राम मंदिर निर्माण के मुद्दे पर अभी तक संघ प्रमुख, विहिप तथा उनके अनुषंगी संगठन मोदी-अमित के निर्देश व उनके तर्कों से सहमत नहीं है, क्योंकि इस मुद्दें पर प्रयाग कुम्भ में संतों के संगठन में फूट भी पड़ चुकी है और साधु-संतों के एक तबके ने 21 फरवरी को राम मंदिर के शिलान्यास की घोषणा भी कर दी है, जिसे कांग्रेस समर्थक बताया जा रहा है, किंतु विहिप भी ऐसे मौके पर चुपचाप बैठकर तमाशा नहीं देखना चाहती, इसी मुद्दें पर प्रधानमंत्री को ‘अपनों’ के बीच नाराजी झेलनी पड़ रही है, अब जो भी हो प्रधानमंत्री को अपनों की नाराजी और प्रतिपक्षी नेताओं को बदनामी तो झेलना ही होगी?

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