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भाजपा से गले मिलने को अगप बेकरार

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गुवाहाटी, । लोकसभा चुनाव 2019 के मद्देनजर राजनीतिक पार्टियां गठबंधन की तलाश में अपने राजनीतिक मोहरे को चलना आरंभ कर चुकी हैं। राज्य की सत्ताधारी पार्टी भाजपा से गठबंधन तोड़ने वाली क्षेत्रीयतावादी पार्टी असम गण परिषद (अगप) की हालत इन दिनों बेहद खस्ता नजर आ रही है। अगप को यह साफ तौर पर नजर आ रहा है कि अगर वह लोकसभा चुनाव में अपने दम पर अकेले उतरी तो एक भी सीट जीतना उसके लिए कठिन कार्य होगा। यही कारण है कि अगप के शीर्ष नेता एक बार फिर से भाजपा से गठबंधन करने के लिए बेकरार नजर आ रहे हैं। राज्य में एक समय दो बार सत्ता पर काबिज अगप वोटों के लिहाज से बेहद निचले पायदान पर खड़ी है। 2014 के लोकसभा चुनाव में अगप को महज 3.80 फीसद मत मिला था। अगप एक भी सीट जीत नहीं पाई थी। वर्तमान समय में अगप की हालत सबसे कमजोर नजर आ रही है। नागरिकता संशोधन विधेयक के मुद्दे पर भाजपा से अलग होने वाली अगप को यह बात समझ में आ गई है की अकेले लड़ना जोखिम भरा कदम होगा। अगप के सूत्रों ने बताया है कि पार्टी अध्यक्ष अतुल बोरा और कार्यकारी अध्यक्ष केशव महंत भाजपा के केंद्रीय नेताओं से मिलकर पुनः गठबंधन में शामिल होने के लिए चर्चा कर रहे हैं। मिली जानकारी के अनुसार अगप का शीर्ष नेतृत्व एक दिन पहले दिल्ली पहुंचकर भाजपा के राष्ट्रीय नेताओं से इस मुद्दे पर चर्चा कर चुका है। सूत्रों ने बताया है कि राज्य की 14 लोकसभा सीटों में से अगप तीन से चार सीटों की मांग कर रही है। वही राजनीति के जानकारों का कहना है कि भाजपा अगप को इतनी सीटें देने के लिए तैयार नहीं होगी। वहीं अगप की आर्थिक दृष्टि से भी हालत काफी कमजोर है। इस लिहाज से लोकसभा चुनाव के लिए अगप को हर हालत में एक साझीदार की जरूरत है। वैचारिक दृष्टि से कांग्रेस के साथ अगप गठबंधन नहीं कर सकती है। अगप के सामने गठबंधन के लिए बेहद सीमित विकल्प हैं। या तो भाजपा के साथ उसे जाना होगा या फिर अकेले दम पर लोकसभा का चुनाव लड़ना होगा। वहीं प्रदेश भाजपा का नेतृत्व इस बात पर अड़ा हुआ है कि लोकसभा चुनाव में वह किसी भी कीमत पर अगप के साथ गठबंधन नहीं करना चाहता। प्रदेश अध्यक्ष रंजीत कुमार दास सार्वजनिक तौर पर इस बात को कई बार दोहरा चुके हैं। हालांकि अगप और भाजपा का गठबंधन दोनों के लिए ही फायदेमंद साबित होगा। राज्य की मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस यह कतई नहीं चाहती कि दोनों के बीच गठबंधन हो। कारण दोनों पार्टियों का वोट बैंक लगभग एक ही पृष्ठभूमि से आता है। ऐसे में दोनों के बीच गठबंधन से कांग्रेस को बड़ा नुकसान होने की संभावना है। इस रणनीति को समझते हुए भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व गठबंधन पर कुछ ले-देकर फैसला कर सकता है।

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