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भोपाल लोकसभा सीट पर ढाई दशक से भाजपा का कब्जा, अब सीट बचाने की चुनौती

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भोपाल, । झीलों का शहर मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल अपने प्राकृतिक सौंदर्य के चलते जहां अपनी अलग पहचान रखता है, तो वहीं यहां का राजनीतिक इतिहास भी कोतूहल से परिपूर्ण रहा है। भोपाल संसदीय सीट पर करीब ढाई दशक से भारतीय जनता पार्टी का कब्जा है और यहां से फिलहाल सांसद आलोक संजर संसद में इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं। साल 1989 के बाद से यहां कांग्रेस पूरी तरह गायब है। यहां ढाई दशक के दौरान जितने भी लोकसभा के चुनाव हुए हैं, कांग्रेस को बुरी तरह शिकस्त मिली है, लेकिन आगामी लोकसभा चुनाव में भाजपा के लिए भोपाल संसदीय सीट को बचाना एक बड़ी चुनौती रहेगी। दरअसल, मध्यप्रदेश में गत दिनों हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने अच्छा प्रदर्शन किया और वह प्रदेश में सरकार बनाने में सफल रही। भोपाल जिले की बात करें, तो यहां की आठ विधानसभा सीटों में पांच पर भाजपा को जीत मिली है, जबकि तीन कांग्रेस के खाते में गई है। फिर भी सरकार बनने के बाद जिस मुख्यमंत्री कमलनाथ अपने वचन पत्र में किये वादों को पूरा करने में जुटे हैं, उससे प्रदेश में कांग्रेस की स्थिति मजबूत होती दिख रही है। वहीं, विधानसभा की जीत से कांग्रेस पार्टी के हौसले बुलंद हैं, जिसका असर भी लोकसभा चुनाव में देखने को मिल सकता है। लिहाजा, भोपाल संसदीय सीट पर भी इस बार कड़ा मुकाबला देखने को मिलेगा। आजादी के बाद भोपाल में लोकसभा की दो सीटें थी, रायसेन और सीहोर। तब सीहोर सीट से कांग्रेस के सैयद उल्लाह राजमी ने उद्धवदास मेहता को हराया था, जबकि रायसेन सीट से कांग्रेस के चतुरनारायण मालवीय ने निर्दलीय उम्मीदवार शंकर सिंह ठाकुर को शिकस्त दी थी। इसके बाद 1957 में दोनों सीटों को मिलाकर एक भोपाल लोकसभा सीट हो गई। वर्ष 1957 में हुए लोकसभा चुनाव में मैमूना सुल्तान ने कांग्रेस का प्रतिनिधित्व किया और उन्होंने हिंदू महासभा के हरदयाल देवगांव को शिकस्त देकर सांसद बनी। इसके बाद उन्होंने 1962 के लोकसभा चुनाव में भी लगातार दूसरी बार हिंदू महासभा के ओमप्रकाश को हराया और सांसद चुनी गईं, लेकिन 1967 के लोकसभा चुनाव में भोपाल सीट पर कांग्रेस को पहली बार हार का सामना करना पड़ा। भारतीय जनसंघ के जेआर जोशी ने कांग्रेस उम्मीदवार मैमूना सुल्तान को तीसरी जीत हासिल करने से रोका और पहली भोपाल सीट पर पहली भार गैर कांग्रेस दल का कब्जा हुआ। हर साल से सबक लेते हुए कांग्रेस ने अगले ही चुनाव में साल 1971 में भोपाल सीट से देश के पूर्व राष्ट्रपति शंकरदयाल शर्मा को अपना उम्मीदवार बनाया और भारतीय जनसंघ के उम्मीदवार उनके सामने टीक नहीं सके। शंकरदयाल शर्मा ने शानदार जीत दर्ज कराते हुए 1971 में कांग्रेस की वापसी कराई, लेकिन आपातल के चलते अगले चुनाव में कांग्रेस को देशभर में करारी हार का सामना करना पड़ा और भोपाल सीट से 1977 में भारतीय लोकदल के उम्मीदवार आरिफ बेग ने शंकरदयाल शर्मा को हरा दिया। इसके बाद 1980 के लोकसभा चुनाव में फिर भोपाल सीट पर कांग्रेस ने पुन: कब्जा किया। इस बार शंकरदयाल शर्मा ने आरिफ बेग को बड़े अंतर से हराया। कांग्रेस ने इस जीत को 1984 के लोकसभा चुनाव में बनाए रखा। हालांकि, इस बार कांग्रेस ने केएन प्रधान को उम्मीदवार बनाया था और वे चुनाव जीतकर भोपाल सीट से सांसद बने, लेकिन इसके बाद भोपाल संसदीय सीट से कांग्रेस पूरी तरह गायब हो गई। भारतीय जनता पार्टी ने भोपाल सीट से 1989 के लोकसभा चुनाव में प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव रहे सुशीलचन्द्र वर्मा को मैदान में उतारा और उन्होंने कांग्रेस को ऐसी शिक्त दी कि वह यहां से फिर दोबारा उबर ही नहीं पाई। साल 1989 से 1998 तक चार बार लोकसभा के चुनाव हुए और सुशीलचन्द्र वर्मा ने चारों बार कांग्रेस को हराकर इस सीट पर भाजपा का कब्जा बरकरार रखा। इसके बाद 1999 में भाजपा नेत्री उमा भारती ने कांग्रेस के दिग्गज नेता सुरेश पचौरी को शिकस्त देकर भोपाल सीट पर भाजपा का कब्जा बनाए रखा। फिर, 2004 और 2009 में भाजपा के दिग्गज नेता कैलाश जोशी ने कांग्रेस उम्मीदवार सुरेन्द्र सिंह ठाकुर को हराया था। पिछले 2014 के लोकसभा चुनाव में यहां से आलोक संजर सांसद बने। इस चुनाव में भाजपा उम्मीदवार आलोक संजर ने कांग्रेस के प्रकाश मंगीलाल शर्मा को हराया। संजर को सात लाख 14 हजार 178 यानी 63.19 फीसदी वोट मिले थे, जबकि शर्मा को तीन लाख 43 हजार 482 यानी 30.39 फीसदी वोट मिले थे। भाजपा को पिछले चुनाव में तीन लाख 70 हजार 696 वोटों से जीत मिली थी। साल 2011 की जनगणना के अनुसार भोपाल की जनसंख्या 26 लाख 79 हजार 574 है। इसमें से 23.71 फीसदी आबादी ग्रामीण क्षेत्र में, जबकि 76.29 फीसदी शहरी इलाके में रहती है। चुनाव आयोग के आंकड़े के मुताबिक 2014 के चुनाव में भोपाल संसदीय सीट पर 19 लाख 56 हजार 936 मतदाता थे। इसमें पुरुषों की संख्या 10 लाख 39 हजार 004 और महिलाओं की संख्या नौ लाख 17 हजार 932 थी। भोपाल में 2014 के लोकसभा चुनाव में 57.75 फीसदी मतदान हुआ था। यानी कुल 11 लाख 30 हजार 182 लोगों ने वोटिंग की थी। इनमें 6,39,683 पुरुष और 4,90,499 महिलाएं शामिल थीं। आलोक संजर भोपाल क्षेत्र की संसद में प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। उनकी पांच साल के दौरान लोकसभा में 86 फीसदी उपस्थिति रही। उन्होंने संसद में 392 प्रश्न पूछे हैं 121 डिबेट में भाग लिया है। ऐसे में आगामी लोकसभा चुनाव में भाजपा के इस गढ़ को ध्वस्त करना कांग्रेस के लिए आसान नहीं होगा, लेकिन इस समय प्रदेश में बदलाव की लहर है। विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को मिली जीत से उसके नेताओं हौसले काफी बुलंद हैं। लिहाजा, भाजपा के लिए अपने गढ़ को बचाना चुनौती से कम नहीं होगा।

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