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इतिहास दोहराते सेना के जांबाज

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भारतीय सेना ने 29 सितंबर 2016 को एलओसी पार कर सर्जिकल स्ट्राइक की थी। इस सर्जिकल स्ट्राइक में 38 से ज्यादा आतंकी और 2 पाकिस्तानी सैनिक मारे गए थे। उल्लेखनीय बात यह कि सर्जिकल स्ट्राइक के लिए जो भारतीय टुकड़ी एलओसी के पार गई थी वह बगैर किसी क्षति के वापस आ गई थी। यह सर्जिकल स्ट्राइक उरी में हुए आतंकी हमले जिसमें 16 भारतीय सैनिक मारे गए थे-उसके चलते की गई थी। तब भारतीय सेना के प्रवक्ता ने कहा था कि यह सर्जिकल स्ट्राइक अंतिम नहीं बल्कि शुरुआत है। निश्चित रूप से इस सर्जिकल स्ट्राइक के चलते पूरा भारत एक नए किस्म के गौरव और मनोबल से भर गया था। सिर्फ भारतवासियों को ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया को यह अहसास हो चला था कि यह नए किस्म का भारत है। इस घटना पर आरंभ में तो कांग्रेस समेत सभी विपक्षी दलों ने स्वागत किया था या यूं कहें कि परिस्थितियों के चलते उन्हें स्वागत करने को बाध्य होना पड़ा था। पर शीघ्र ही उनकी समझ में यह आ गया कि इसके चलते प्रधानमंत्री मोदी का कद बढ़ सकता है। परिणामतः इसका लाभ भाजपा को आने वाले कुछ राज्यों के विधानसभा के चुनावों में मिल सकता है। फलतः तत्काल उनके सुर बदल गए। आम आदमी पार्टी के सर्वेसर्वा अरविंद केजरीवाल सर्जिकल स्ट्राइक का सबूत मांगने लगे। कांग्रेस के बड़बोले नेता संजय निरुपम ने कहा कि यह सर्जिकल स्ट्राइक सियासी फायदे के लिए की गई है। राहुल गांधी ने तो इसको लेकर मोदी सरकार पर सैनिकों के खून की दलाली का आरोप तक लगा दिया। कुछ दिनों बाद जब भारतीय सेना ने सर्जिकल स्ट्राइक के सबूत स्वतः प्रस्तुत कर दिए, तब सभी विरोधी दलों और उनके नेताओं की बोलती बंद हो गई। 14 फरवरी को पुलवामा में आतंकियों द्वारा 44 भारतीय सैनिकों की हत्या के बाद जब 26 फरवरी को पाकिस्तान के बालाकोट में वायुसेना ने सर्जिकल स्ट्राइक करते हुए जैश के सैकड़ों आतंकियों को मार दिया तो उरी हमले के बाद की गई सर्जिकल स्ट्राइक की तरह प्रारंभ में इसका भी स्वागत किया गया। राहुल गांधी ने ट्वीट करते हुए भारतीय सेना को सलाम किया। लेकिन पूर्व की भांति जब कांग्रेस पार्टी एवं दूसरे विरोधी दल के नेताओं को ऐसा लगा कि इस कदम का श्रेय मोदी को मिल रहा है। इसका फायदा उन्हें आने वाले लोकसभा चुनाव में मिल सकता है, तो उनके तेवर बदल गए। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने तो इन घटनाओं की टाइमिंग पर ही सवाल उठा दिया। कुछ इस अंदाज में जैसे आसन्न लोकसभा चुनाव को देखते हुए मोदी सरकार ने ही पुलवामा हमला कराया हो। कांग्रेस नेता बीके हरिप्रसाद ने पूरी बेशर्मी से कह दिया कि पुलवामा हमला नरेंद्र मोदी और इमरान खान की मिलीभगत के चलते हुआ है। आगे चलकर ममता ने विदेशी मीडिया के आधार पर बालाकोट में किसी भी आतंकी के न मारे जाने की बातें कही। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने दोनों देशों को एक तराजू में रखते हुए कह दिया कि भारत और पाकिस्तान के बीच उन्माद भड़काने की जैसे होड़ मची हुई है। बड़बोले कांग्रेसी नेता कपिल सिब्बल ने ममता के सुर में सुर मिलाया तो पी चिदंबरम ने भी इस सर्जिकल स्ट्राइक पर सवाल उठाते हुए कहा कि हताहतों की संख्या 300-350 किसने बताई ? गैर जिम्मेदाराना बयान देने में उस्ताद दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने तो यहां तक कह दिया कि लोकसभा में 300 सीटें लाने के लिए मोदी सैनिकों को मरवा रहे हैं। मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने कहा कि जैसे अमेरिका ने ओसामा बिन लादेन के मरने का प्रमाण दिया था, उसी तरह सरकार को भी बालाकोट में मारे गए लोगों का प्रमाण देना चाहिए। नवजोत सिंह सिद्धू ने तो यह सवाल उठा दिया कि आप आतंकियों को मारने गये थे या पेड़ों को गिराने ? इस संदर्भ में वायुसेना चीफ ने भले यह कहा हो कि इस हमले में कितने लोग मारे गए, यह पता करना वायु सेना का काम नहीं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि इस हमले में आतंकी मारे ही नहीं गए। उनका कहने का तात्पर्य था कि इस संबंध में मृतकों की सटीक संख्या नहीं बताई जा सकती। अलबत्ता सेना के चीफ ने यह भी कहा अगर जंगलों में बम गिराए गये होते तो पाकिस्तान की तरफ से हमला क्यों होता? दूसरी तरफ भारतीय खुफिया एजेंसी एनटीआरओ के सर्विलांस के अनुसार उस वक्त आतंकी कैम्प में 300 मोबाइल फोन एक्टिव थे। हवाई हमले के बाद जो नष्ट पाए गये। इटैलियन पत्रकार फ्रांसिस्को मरीनों के अनुसार इस हमले में कई आतंकियों के मारे जाने के साथ दो आईएसआई के कर्नल भी मारे गए। जैश के चीफ मसूद अजहर के भाई मौलाना अम्मार का वीडियो वायरल हुआ है। उसमें वह कहता है कि भारत के लड़ाकू विमानों ने बालाकोट में बड़ी तबाही मचाई है। उन्होंने हमारे केंद्र को निशाना बनाया जहां स्टूडेंट जिहाद के बारे में सीख रहे थे, ताकि वो कश्मीर के मुसलमानों की मदद कर सकें। बड़ा सच यह है कि आज भारत के पास ऐसे उपग्रह हैं जो पाकिस्तान की अधिकांश क्षेत्र की जानकारी रखते हैं और उपग्रह की दी गई जानकारी के अनुसार बालाकोट के उस स्थान में 300 से ज्यादा आतंकी प्रशिक्षण ले रहे थे। गौर करने की बात यह है यदि बम जंगलों में गिराए गए होते तो क्या पाकिस्तान की संसद में इमरान खान को लेकर शर्म-शर्म के नारे लगाए गए होते ? लाख टके की बात यह है कि यदि बम गिरने से वहां पेड़ टूटे तो पाकिस्तान सरकार ने विदेशी मीडिया को वहां जाने क्यों नहीं दिया? इतना ही नहीं वहां के भवनों को प्रदर्शित क्यों नहीं किया? खबर है की वायु सेना ने इस संबंध में पुख्ता प्रमाण सरकार को सौंप दिए हैं जिन्हें सरकार उचित समय पर सार्वजनिक करेगी। लेकिन अब तक जो परिस्थितियां एवं प्रमाण हमारे सामने हैं उसमें यह माने जाने का पर्याप्त आधार हैं कि हमारी वायु सेना ने 26-27 फरवरी की रात आतंकवाद को समूल नष्ट करने की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है। उम्मीद है कि पाकिस्तान में पल रहे सभी आतंकी शीघ्र ही या तो यमलोक पहुंचा दिए जाएंगे या भारत की गिरफ्त में होंगे। मोदी सरकार की यह एक बड़ी सफलता है कि पूरा विश्व जनमत इस मामले में भारत के साथ खड़ा है। यहां तक की अधिकांश इस्लामी देश भी भारत के साथ हैं। विडंबना है कि भारतीय राजनीति में विपक्ष की प्राथमिकता देश नहीं सत्ता है। इसीलिए जहां उसे ऐसे मामलों में सरकार और सेना के साथ खड़ा होना चाहिए वहां वह क्षुद्र राजनीति करने पर उतारू है। लोगों को याद होगा, 1971 के पाकिस्तान के साथ हुए युद्ध में तब के जनसंघ के नेता स्व. अटल बिहारी वाजपेयी ने पूरी तरह तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का समर्थन किया था। वस्तुतः राष्ट्र पहले और दल बाद में यही नीति है। ऐसे लोग यदि औपचारिक रूप से समर्थन भी करते हैं तो मात्र सेना का। जबकि बांग्लादेश के निर्माण को लेकर आज तक यही लोग कहते हैं कि इंदिरा गांधी ने इतिहास ही नहीं भूगोल भी बदल दिया था। ऐसी स्थिति में जब मोदी कहते हैं यदि यह अभियान असफल हो जाता तो किसे जिम्मेदार ठहराया जाता ? स्पष्ट है कि यदि गाली मोदी को तो ताली क्यों नहीं ? भारतीय विरोधी दलों की समस्या यह है कि उनका राष्ट्रबोध ही लुप्त प्राय हो गया है। इसीलिए पुलवामा हादसे के बाद मोदी के 56 इंच के सीने और तरह-तरह की बातें उठाई गईं। लेकिन जब अप्रत्याशित रूप से आतंकवाद के विरुद्ध प्रभावी कार्रवाई हो गई तो एक तरफ कुछ लोग उसका सबूत मांगने लगे तो कुछ लोग इस युद्धोन्माद से जोड़ने लगे। लोगों को शायद याद हो कि 1999 की कारगिल की लड़ाई में सोनिया गांधी ने कहा था, वाजपेयी फौज को कटवा रहे हैं, जिसकी व्यापक प्रतिक्रिया हुई थी। हकीकत यह है कि विरोधी दल चाहते हैं कि जो कुछ हुआ उसका श्रेय मोदी को न मिले। इसलिए वह तरह-तरह के प्रश्न खड़ा कर रहे हैं। लेकिन उन्हें पता होना चाहिए कि इस तरह से वह अपने को और विवादित बना रहे हैं। बालाकोट में एयर स्ट्राइक के बाद हुए जनमत सर्वे में मोदी की लोकप्रियता अप्रत्याशित रूप से बढ़ गई है। लेकिन इस तरह से 2016 का इतिहास दोहराकर और विरोध के लिए विरोध कर कांग्रेस समेत विपक्षी पार्टियां कहीं न कहीं अपने पैरों में कुल्हाड़ी मार रही हैं।

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