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लोकसभा चुनाव: फिर दिखेगा यूपी का दम

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देश में 17वीं लोकसभा चुनाव की दुंदुभि बज गई है। 16वीं लोकसभा का कार्यकाल, 3 जून, 2019 को समाप्त हो रही है। चुनाव आयोग ने चुनाव तिथियों की घोषणा कर दी है। इसी के साथ देशभर में आदर्श चुनाव आचार संहिता लागू हो गई है। सात चरणों में 11 अपैल, 18 अप्रैल, 23 अप्रैल, 29 अप्रैल, 6 मई, 12 मई और 19 मई को मतदान होने हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल में सभी सात चरणों में मतदान कराए जाएंगे। मतगणना 23 मई को होगी। पूरी दुनिया की नजर भारत में होने वाले लोकसभा चुनाव पर टिक गई है। उत्तर प्रदेश फिर सभी की नजरों में है। यहां लोकसभा की सर्वाधिक 80 सीटें हैं और 2014 के लोकसभा में भाजपा और उसके सहयोगी दलों ने उत्तर प्रदेश की 73 सीटों पर अपना विजयध्वज लहराया था। अकेले भाजपा यहां 71 सीटों पर चुनाव जीती थी। इस नाते सबकी नजर इस बात पर भी है कि इस लोकसभा चुनाव को लेकर उत्तर प्रदेश की जनता की सोच क्या है? हालांकि उत्तर प्रदेश के चुनाव नतीजे हमेशा विस्मयकारी रहे हैं। उम्मीद की जा सकती है कि इस बार भी कुछ ऐसा ही होगा। वैसे तो इस बार पूरे देश में चुनाव विकास के मुद्दे पर ही लड़ा जाएगा लेकिन चौकीदार बनाम चोर, कामदार बनाम नामदार, जाति और धर्म के मुद्दे भी कम प्रभावी नहीं होंगे। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने कहा है कि इस बार सर्जिकल स्ट्राइक मतदाता करेंगे। इसमें कोई संदेह नहीं है। मतदाता हर चुनाव में सर्जिकल स्ट्राइक करते हैं। इस बार का चुनाव भी उसका अपवाद नहीं होगा। हालांकि इस चुनाव के केंद्र में भाजपा ही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सत्ता से हटाने के लिए विपक्ष एकजुट हो रहा है। कहीं संपूर्णता में और कहीं अंशतः। भाजपा इन दलों को महामिलावट कह रही है। वह इस चुनाव में 300 से अधिक सीटें जीतने के दावे कर रही है। दूसरीओर, विपक्ष उसे सबसे कम सीटों पर सिमटता बता रहा है। कयासों का बाजार गर्म है। लेकिन इसमें संदेह नहीं कि इस बार का चुनाव हर चुनाव से ज्यादा रोचक और आक्रामक होगा। यह कहने में शायद ही किसी को गुरेज हो कि देश में विकास का इकतारा भले ही अपना बहुत प्रभाव न छोड़ पाए लेकिन जाति के सौ तारों वाले संतूर को साधने के बाद ही चुनावी विजय की धुन निकलेगी। धर्म और जाति के मुद्दे हर चुनाव में हावी रहे हैं। इस चुनाव में भी उसका असर दिखना लगभग तय है। उत्तर प्रदेश में जातीय समीकरणों को साधने का हर संभव प्रयास हुआ है। सपा और बसपा गठजोड़ मैदान में है। कांग्रेस पर भी गठबंधन के पासे इन दोनों दलों ने फेंके जरूर, लेकिन कांग्रेस ने यूपी में अकेले दम पर चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी है। चुनाव की दुंदुभि बजने के बाद उसका रुख क्या होगा, यह तो बाद में पता चलेगा लेकिन इस बार सांसें रोक देने वाला हैरतअंगेज चुनाव होगा। जातीय समीकरणों पर गौर करें तो उत्तर प्रदेश में 49 जिले ऐसे हैं, जहां सबसे ज्यादा संख्या में दलित मतदाता हैं। कुछ जिलों को अपवाद मानें तो शेष जिलों में दलित दूसरा सबसे बड़ा वोट बैंक है। 20 जिले ऐसे हैं, जहां मुस्लिम वोटर सबसे ज्यादा हैं और 20 जिलों में वे दूसरा सबसे बड़ा वोट बैंक भी हैं। सूबे की सियासत की बड़ी रेखा तीन प्रमुख जातियां यादव, ठाकुर और ब्राह्मण खींचती हैं। अतिरिक्त पिछड़ा वर्ग संख्या के लिहाज से प्रदेश में सबसे ज्यादा है। हिंदू-मुस्लिम और अतिरिक्त पिछड़ा वर्ग को जोड़ दें तो हर जिले में इनकी संख्या सर्वाधिक है। इसमें शक नहीं कि ओबीसी समूह के तौर पर वोट नहीं करता। ओबीसी में सबसे ज्यादा यादव हैं। उत्तर प्रदेश के 44 जिलों में 8 फीसदी से अधिक यादव मतदाता हैं। इनमें से 9 जिलों में यादवों की हिस्सेदारी 15 फीसदी या इससे ऊपर है। एटा, मैनपुरी और बदायूं में यादव मतदाता मुस्लिम मतदाताओं के बराबर हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के 10 जिलों में यादवों की संख्या नगण्य है। इन इलाकों में जाट और गुर्जरों की खासी तादाद है। जाट मतदाताओं का पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में खास असर है। बागपत में तो लगभग 40 प्रतिशत जाट और गुर्जर मतदाता हैं। बुंदेलखंड और पूर्वांचल के जिलों में लोध, कुर्मी, पाल और कुशवाहा जैसी जातियां यादवों के बराबर हैं। ये जातियां यादवों के प्रभाव को न्यूट्रल भी करती रही हैं। अति पिछड़ी जातियों की भी यहां लंबी जमात है जिनके पास अलग-अलग सीटों पर चुनाव जिताने की कुंजी है। जाति का खेल हर चुनाव में खेला जाता रहा है। इस चुनाव में भी उसकी पटकथा सभी दल अपने-अपने तरीके से लिखने में जुटे हैं। 60 जिलों में ब्राह्मण मतदाताओं की संख्या 8 प्रतिशत से अधिक है। 29 जिलों में यह संख्या 12 फीसद है। प्रदेश में ठाकुर मतदाता 5 से 6 प्रतिशत संख्या में हैं। पूर्वांचल के जिलों में ठाकुर और भूमिहार मतदाताओं की हिस्सेदारी 10 प्रतिशत है। गोरखपुर, कुशीनगर, देवरिया, आजमगढ़, मऊ, बलिया, जौनपुर, गाजीपुर, चंदौली, वाराणसी, मथुरा, आगरा, हरदोई, उन्नाव, रायबरेली, सुल्तानपुर, बांदा और चित्रकूट ऐसे जिले हैं, जहां यादवों के साथ ठाकुरों की बहुतायत है। इन तीन प्रमुख जातियों की तुलना में वैश्य या बनिया समुदाय की आबादी प्रदेश में कम है, लेकिन अपनी आर्थिक ताकत के कारण इनकी जरूरत हर दल को पड़ती है। कुर्मी जाति भी उत्तर प्रदेश चुनाव में अहम भूमिका निभाएगी, इसमें कोई संदेह नहीं है। कुर्मी जाति की दमदार मौजूदगी संत कबीरनगर, मिर्जापुर, सोनभद्र, बरेली, उन्नाव, जालौन, फतेहपुर, प्रतापगढ़, कौशांबी, इलाहाबाद, सीतापुर, बहराइच, श्रावस्ती, बलरामपुर, सिद्धार्थ नगर और बस्ती जिलों में देखी जा सकती है। इन 16 जिलों में कुर्मी मतदाता 6 से 10 प्रतिशत तक हैं। कुर्मी के अलावा लोध या लोधी मतदाता भी सूबे में मजबूत स्थिति में हैं। रामपुर, ज्योतिबा फुले नगर, बुलंदशहर, अलीगढ़, माहामाया नगर, आगरा, फिरोजाबाद, मैनपुरी, पीलीभीत, लखीमपुर खीरी, उन्नाव, शाहजहांपुर, हरदोई, फर्रुखाबाद, इटावा, औरैया, कन्नौज, कानपुर, जालौन, झांसी, ललितपुर, हमीरपुर और महोबा जिलों में लोध मतदाता 5 से लेकर 10 प्रतिशत हैं। उत्तर प्रदेश के जातीय समीकरण पर गौर करें तो सामान्य वर्ग की संख्या-20.95 फीसदी, अन्य पिछड़े वर्ग की संख्या -54.05, अनुसूचित जाति-24.94 व अनुसूचित जनजाति-0.06 प्रतिशत है। अन्य पिछड़े वर्ग की 54.05 प्रतिशत की आबादी में यादव-19.40 यानी 10.46 प्रतिशत, अति पिछड़े वर्ग लोधी, कुर्मी, जाट, गुर्जर, सोनार, अरख, गोसाई, कलवार आदि की आबादी 10.22 प्रतिशत है। इसमें कुर्मी-7.46, लोध-6.06, जाट-3.60, गूजर-1.71, कलवार-0.70 प्रतिशत हैं। अत्यन्त पिछड़े वर्ग की आबादी अन्य पिछड़े वर्ग में 61.59 प्रतिशत यानी कुल जनसंख्या में 33.34 प्रतिशत है। इसका उत्तरप्रदेश की राजनीति में खासा महत्व है। अत्यन्त पिछड़े वर्ग में निषाद,कश्यप,बिन्द, रायकवार-12.91 प्रतिशत, पाल, बघेल-4.43, कुशवाहा, मौर्य, शाक्य, काछी, माली-8.56, मोमिन, अंसारी-4.15, तेली, साहू-4.03, प्रजापति-3.42, हज्जाम, नाई,सविता-3.01, राजभर-2.44, चौहान,नोनिया-2.33, बढ़ई, विश्वकर्मा-2.44, लोहार-1.81, फकीर-1.93, कन्डेरा, मंसूरी-1.61, कान्दू, भुर्जी-1.43, दर्जी-1.01, व अन्य अत्यन्त पिछड़ी जातियों की संख्या-12.97 प्रतिशत हैं। उत्तर प्रदेश के समीकरण में अतिपिछड़ी, विशेषकर सर्वाधिक पिछड़ी जातियों का 50 प्रतिशत से अधिक रुझान जिस दल की ओर होता है, उत्तर प्रदेश में वही दल सिकन्दर बनता है। लोकसभा चुनाव-2014 में सामाजिक समीकरण व अतिपिछड़ों की बदौलत अप्रत्याशित सफलता प्राप्त करने वाली भाजपा हर स्तर पर पिछड़ों, अतिपिछड़ों को साधने में जुटी है। लोकसभा चुनाव में 33 प्रतिशत से अधिक संख्या वाली अत्यन्त पिछड़ी निषाद, मल्लाह, केवट, लोध, कोयरी, बंजारा, माली, सैनी, लोहार, बढ़ई, नाई, हज्जाम, बारी, धीवर, कहार, राजभर, बियार, नोनिया, किसान, गोड़िया, तेली, तमोली, बरई आदि जातियों की भूमिका काफी अहम होगी। उत्तरप्रदेश से 80 सांसदों में ब्राह्मण-17, राजपूत -16, जाट, यादव, लोधी, कुर्मी-5-5, मौर्य, कुशवाहा,सैनी, निषाद,कश्यप-3-3, जाटव, गुर्जर, वाल्मीकी-2-2, पासी-6, कोरी,भूमिहार, धोबी, मल्लाह, खटिक, धानिक, खरवार जाति के 1-1 सांसद हैं। उत्तर प्रदेश से केन्द्रीय मंत्री मण्डल में 11 मंत्री हैं, जिनमें 3 ब्राह्मण, 2 राजपूत, 1-1 लोधी, निषाद, कुर्मी, धानुक, जाट, भूमिहार जाति के हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को 2009 के मुकाबले 25 प्रतिशत अधिक वोट मिले थे। उत्तर प्रदेश में 2009 में उसे 17.5 प्रतिशत वोट के साथ 10 सीटें मिली थी जबकि 2014 में 42.3 प्रतिशत वोट के साथ उसने 71 सीटों पर अपना विजयी परचम लहराया था। 25 प्रतिशत वोट भाजपा को कहां से मिले, इसे लेकर विपक्ष में लंबे समय तक खलबली भी रही। इस बार सपा-बसपा गठबंधन की कोशिश यादव, मुस्लिम और दलित मतों को अपने पक्ष में करने की तो है ही,वे सवर्णों को भी अपने साथ जोड़ना चाहते हैं। वैसे कांग्रेस भी सवर्णों के साथ-साथ दलितों और पिछड़ों को साधने में जुटी है और भाजपा का तो नारा ही है-सबका साथ-सबका विकास। उसने जिस तरह पूर्वांचल और पश्चिमांचल के विकास के प्रयास किए हैं, उसका लाभ उसे मिल सकता है। यह चुनाव राष्ट्रवाद, विकासवाद के दावों पर भी लड़ा जाएगा। विपक्ष का प्रयास भाजपा को यूपी में ही नहीं, पूरे देश में रोकने का है लेकिन भाजपा ने भी विपक्ष को घेरने के लिए विकास के जो चौसर बिछाए हैं, विपक्ष उसे नजरंदाज तो कर सकता है, झुठला तो सकता है लेकिन उसके प्रभावों से बच नहीं सकता। झूठ और सच का सियासी खेल तो चुनाव पूर्व से ही आरंभ हो गया था। इसमें तेजी ही आएगी। बहरहाल, चुनाव आग का वह दरिया है जिसमें सभी को डूब कर बैतरणी पार करनी है।

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