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सत्यनिष्ठ न्याय का इंतजार करती अयोध्या

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माननीय सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने तय कर दिया है कि अब मध्यस्थ ही तय करेंगे कि अयोध्या में हिन्दुओं के आराध्य भगवान श्रीराम जन्मभूमि मंदिर बनेगा या नहीं। अयोध्या में विवादित ढांचे को ढहाने के दशकों पहले से रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद न्यायालय से न्याय की आस में लंबित है। मुस्लिम पक्ष विवादित ढांचे पर से दावा छोड़ने को तैयार नहीं है। दूसरी ओर हिन्दू यह मानते हैं कि भगवान राम की जन्मस्थली अयोध्या ही है। माना जाता है कि जन्मस्थान पर बने भगवान राम का मंदिर तोड़कर 15वीं सदी में आक्रमणकारी बाबर द्वारा मस्जिद निर्माण किया गया। जाहिर है कि मामला महज राम के मंदिर का नहीं है। राम का मंदिर कहीं भी बनाया जा सकता है। राम जन्मभूमि मंदिर का निर्माण सिर्फ उनके जन्म स्थान अयोध्या में ही हो सकता है। इस भावना से विश्व के करोड़ों हिन्दुओं की आस्था जुड़ी होने के कारण मामला सिर्फ जमीन विवाद का नहीं रह गया है। इसे सुप्रीम कोर्ट ने भी माना है। 2014 में एनडीए की पूर्ण बहुमत सरकार बनने पर सरकार से यह स्वाभावत: अपेक्षा की गयी कि सोमनाथ मन्दिर की तरह अध्यादेश लाकर रामजन्मभूमि मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया जाए, जबकि सरकार भी सुप्रीम कोर्ट से इस मामले का हल चाहती रही है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय का निर्णय आने के बाद सभी पक्ष इससे संतुष्ट नहीं हुए और उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। उम्मीद की गयी कि अब शीघ्र इस मामले में स्पष्ट निर्णय आ जाएगा। किसी न किसी कारण से न्यायालय में मामला खिंचता रहा। भाजपा व तमाम हिन्दूवादी संगठनों के साथ आम जनता भी रामजन्मभूमि विवाद का निपटारा चाहती है। लेकिन कुछ लोग इसे 2019 लोकसभा चुनाव में मिलने वाले नफा-नुकसान का आंकलन के चलते चुनाव तक टाल देना चाहते थे। न्यायालय चाहता तो आस्था के इस विषय पर दिन प्रतिदिन सुनवाई कर निर्णय दे सकता था। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। उच्चतम न्यायालय ने राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद भूमि विवाद मामले की सुनवाई करते हुए इसे मध्यस्थता के लिए भेज दिया। इसके लिए न्यायालय ने शीर्ष अदालत के सेवानिवृत्त न्यायाधीश एफ एम आई कलीफुल्ला को मध्यस्थता के लिए गठित तीन सदस्यीय समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया है। आध्यात्मिक गुरू श्री श्री रविशंकर और वरिष्ठ अधिवक्ता श्रीराम पंचू को इसका सदस्य बनाया गया और 8 हफ्ते में रिपोर्ट मांगी गई। तब तक लोकसभा का चुनाव बीत जाएगा। यानि चुनाव में इसका फायदा दल विशेष को नहीं मिल सकेगा। न्यायालय ने समझौते के माध्यम से इस अत्यंत संवेदनशील मामले का हल निकालने का बेहतर प्रयास किया है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के 2010 के फैसले के खिलाफ शीर्ष अदालत में 16 याचिकाएं दायर हुई हैं। तब उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा था कि अयोध्या में 2.77 एकड़ की विवादित भूमि तीनों पक्षकारों सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और रामलला के बीच बराबर बांट दी जाए। यह एक निर्णय था जो लोगों को संतुष्ट नहीं कर सका। सुप्रीम कोर्ट इस मामले का मध्यस्थता से हल निकालना चाहता है। इससे पहले कांची कामकोटि के शंकराचार्य ने ऐसी ही पहल की थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने भी समझौते के लिए पहल की थी , जो उनके पद से हटते ही समाप्त हो गई। श्री श्री रविशंकर ने इससे पहले मध्यस्थता का प्रयास करते हुए अपील की थी कि मुस्लिम पक्ष करोड़ों हिन्दुओं के आराध्य भगवान श्री राम की जन्मस्थली से जुड़ी आस्था का सम्मान करते हुए अपना दावा छोड़ दे। इस अपील को आधार बना कर ही कुछ लोग उनकी निष्पक्षता पर सवाल उठा रहे हैं। इससे अलग कुछ सवाल भी आम जनता के जेहन में है, जिसका जवाब किसी ने अभी तक दिया नहीं है। जैसे - यह सभी मानते हैं कि आस्था से जुड़े धार्मिक मामले का विशुद्ध राजनीतिकरण हो गया है। सभी राजनीतिक दल इसमे अपनी रोटियां सेंक रहे हैं। ऐसे में क्या यह अच्छा नहीं होता कि सुप्रीम कोर्ट समझौते की जगह तर्क संगत वैज्ञानिक, पुरातात्विक,ऐतिहासिक सिद्ध तथ्यों के आधार पर न्याय संगत निर्णय करता। बहरहाल, उम्मीद की जा रही है कि समझौता ही बेहतर तरीका साबित हो। लोग सुप्रीम कोर्ट का निर्णय मानने का मन बना चुके थे। लेकिन क्या सभी पक्ष समझौता आधारित निर्णय मान लेंगे? विपरीत निर्णय आने पर क्या हिन्दू यह मान लेंगे कि भगवान श्रीराम की जन्मस्थली अयोध्या में नहीं, कहीं अन्यत्र थी? महत्वपूर्ण यह कि जब मामला सर्वोच्च अदालत के समक्ष है तो न्याय के मूल सिद्धांतों के अनुरुप निर्णय न देकर समझौता एक्सप्रेस की सवारी तब क्यों की जा रही है, जब सभी पक्षों में इसे लेकर स्वीकार्यता नहीं है। समझौते का निर्णय यदि लोगों ने स्वीकार नहीं किया तो इससे देश के समक्ष कहीं यह संदेश तो नहीं जा रहा है कि सोमनाथ मंदिर की तर्ज पर राम जन्मभूमि मन्दिर का निर्माण अध्यादेश के माध्यम से सरकार ही करा सकती है। सवाल, चिन्ताएं, तर्क, तथ्य, आस्था, विश्वास, धर्म, राजनीति के बीच अयोध्या अर्थात युद्ध नहीं की भावना ही देश हित में सर्वोपरि होनी चाहिए। हिन्दू-मुस्लिम के बीच किसी भी तरह का विवाद राजनीति के हित में तो हो सकता है, देशहित में तो कदापि नहीं है। धर्म स्थल की इस लड़ाई को अयोध्या ( युद्ध नहीं) के नाम के अनुरुप सार्थक करते हुए दोनों पक्ष को सौहार्दपूर्ण समझ के साथ तर्कपूर्ण न्याय के साथ जाना होगा। इस न्याय में जब सतयुग के राजा हरिश्चन्द्र, त्रेतायुग युग के भगवान राम तथा द्वापर युग के कर्ण के सद्गुणों ( सत्य + मर्यादा + दान) का समावेश जरूरी होगा, तभी कलियुग के 21वीं सदी के स्वर्णिम मजबूत भारत का निर्माण होगा।

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