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चुनाव तिथियों पर बेकार की आपत्ति

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भारत उत्सवधर्मी देश है। बिना उत्सव के इस देश में कुछ होता ही नहीं है। जीवन और मृत्यु दोनों का स्वागत यहां उत्सवी माहौल में होता है। अन्य देशों में चुनाव औपचारिकता होती होगी लेकिन भारत में चुनाव भी त्यौहार है। यह लोकतंत्र का महापर्व है। चुनाव आयोग की घोषणा के साथ ही देश भर में आदर्श आचार संहिता लागू हो गई है। लेकिन इसी के साथ चुनाव तिथियों को लेकर राजनीतिक घमासान भी आरंभ हो गया है। कुछ राजनीतिक दलों ने चुनाव तिथियों के औचित्य पर सवाल उठाया है। इसे एक वर्ग को चुनाव में भाग लेने से रोकने की साजिश कहा है। ऐतराज संक्रामक रोग की तरह है, जो पैदा तो छोटी जगह, कोने-अतरे में होता है लेकिन पलक झपकते ही अपना रूप व्यापक कर लेता है। ऐतराज की संक्रामकता सुरसा के मुख की तरह बढ़ती है। लखनऊ में मुस्लिम धर्मगुरु फिरंगी महली ने चुनाव तिथियों को लेकर ऐतराज जाहिर किया है। उनका कहना है कि इस साल रमजान का महीना 5 मई से आरंभ हो रहा है। ऐसे में कुछ चुनाव तिथियां रमजान के बीच में पड़ रही हैं। इससे मुस्लिम मतदाताओं को वोट डालने में परेशानी हो सकती है। इसलिए चुनाव आयोग को उक्त तिथियों में परिवर्तन करना चाहिए। आम आदमी पार्टी के प्रवक्ता संजय सिंह ने आरोप लगाया है कि केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार चाहती ही नहीं है कि मुसलमान वोट डालें। कुछ अन्य विपक्षी दल भी अगर इसी तरह के विचार करें तो इसमें कोई ताज्जुब भी नहीं होना चाहिए। चुनाव में इस तरह के विचार उठते रहते हैं। लेकिन इस तरह के सवाल उठाने वालों को यह भी सोचना होगा कि जिन तिथियों का मुद्दा वे उठा रहे हैं, उन तिथियों में दूसरे धर्म के भी पर्व त्यौहार पड़ रहे होंगे। उन धर्मों के धर्मगुरुओं में से शायद किसी ने भी चुनाव तिथि को लेकर आपत्ति नहीं की क्योंकि उनके लिए देश धर्म से बड़ा है। जब मामला देश के भविष्य का हो, उसकी बेहतरी का हो तो धर्म और जाति के मुद्दे स्वतः गौण हो जाते हैं। जिन दिनों में चुनाव अधिसूचना से लेकर मतगणना तक होनी है, उन दिनों में किसानों के पास बहुत सारे काम होते हैं लेकिन देश के किसी भी किसान या उनके संगठन ने कभी चुनाव तिथियों को लेकर आपत्ति नहीं की। असदुद्दीन ओवैसी का विचार स्तुत्य है कि चुनाव तिथियों पर राजनीति नहीं की जानी चाहिए। उन्होंने विश्वास जताया है कि इन तिथियों में मुसमान पहले से अधिक मतदान करेंगे। देश को इसी तरह के सकारात्मक चिंतन की जरूरत है। यहां तो कुछ राजनीतिक दल दो-एक दिन देर से आचार संहिता लागू होने को लेकर चुनाव आयोग से नाराज हैं और उस पर आरोपों की तोप दाग रहे हैं और कहां रमजान के बहाने चुनाव तिथियों को टालने की दलीलें दी जा रही हैं। इस तरह का विरोधाभास आखिर कब तक चलेगा? इसी माह की 20-21 मार्च को हिंदुओं का सबसे बड़ा पर्व होली पड़ रहा है। 18 मार्च को अधिसूचना होनी है। जाहिर सी बात है कि इसी अवधि में प्रत्याशियों और उनके समर्थकों को नामांकन की तैयारियां करनी होंगी, सवाल तो उन्हें उठाना चाहिए। जिन तिथियों में चुनाव होना है उनमें 11 अप्रैल को षष्ठी यानी छठ माता का उपवास, 18 अप्रैल चुतुर्दशी और पूर्णिमा पड़ रही है। मतलब भगवान शिव और भगवान विष्णु की प्रसन्नता के लिए किया जाने वाला स्नान दान का बड़ा पर्व। 12 मई को अष्टमी और 19 मई को जेठ माह का पहला दिन है। इस दिन देश के अनेक हिस्सों में जेठ मेला लगता है। इससे ठीक एक दिन पहले वैशाख पूर्णिमा है। वैशाख पूर्णिमा पर लोग न केवल दिनभर व्रत रहते हैं बल्कि गंगा आदि पवित्र नदियों में स्नान भी करते हैं। मध्य में 14 अप्रैल को आंबेडकर जयंती और 17 को महावीर जयंती है। इन तिथियों की अहमियत भी किसी से कम नहीं है। ऐसे में आस्था के नाम पर तिथियों में परिवर्तन की नसीहत किसी भी लिहाज से ठीक नहीं है। 3 जून 2019 को 16वीं लोकसभा का कार्यकाल समाप्त हो रहा है। 17वीं लोकसभा का गठन होना है तो इन्हीं तिथियों में चुनाव कराना होगा। रमजान एक माह का होता है। रमजान में चुनाव न कराएं तो जाहिर सी बात है कि चुनाव 5 जून के बाद कराना होगा। यह तो धर्मसंकट ही नहीं, संवैधानिक संकट भी है। देश धर्म से नहीं, संविधान से चलता है। इसलिए भी चुनाव की तिथियों में किसी भी तरह का मीन-मेख उचित नहीं है। 2019 के चुनावी महाभारत में चुनाव तारीखों पर संग्राम का आगाज ठीक नहीं है। जो विपक्षी दल रमजान के दौरान मतदान पर सियासी बयानबाजी कर रहे हैं, उन्हें यह तो बताना चाहिए कि क्या देश में राष्ट्रपति शासन लगा दिया जाए और जिस माह में देश में किसी भी धर्म के त्यौहार न पड़ते हों, उसमें मतदान कराए जाएं। क्या इसके लिए सभी विपक्षी दल तैयार हैं? अगर ऐसा होता है तो चुनाव और सीमा की सुरक्षा जैसे मुद्दों पर सरकार को एक साथ जूझना नहीं होगा। तर्क दिया जा रहा है कि कुल 543 में से 169 लोकसभा सीटों पर रमजान के दौरान मतदान होना है। खासकर उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और दिल्ली की अधिकतर सीटों पर आखिरी तीन चरण में ही मतदान होना है। मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा ने तय कर दिया है कि इस बार सात चरणों में लोकसभा चुनाव होंगे। 11 अप्रैल को पहले चरण की वोटिंग के बाद 18 अप्रैल, 23 अप्रैल, 29 अप्रैल, 6 मई, 12 मई और 19 मई को मतदान कराए जाएंगे। कहा जा रहा है कि रमजान में मुस्लिम मतदाता सुबह से शाम तक बिना कुछ खाए-पिए रोजा रखते हैं। ऐसे में भीषण गर्मी में घंटों कतार में लगकर वोट डालना उनके लिए तकलीफदेह होगा। लिहाजा इन राज्यों के मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में मत प्रतिशत घट सकता है। स्थानीय स्तर पर मुस्लिम मतदाता जिन पार्टियों को भी वोट देते हैं, उन्हें नुकसान हो सकता है और उनके विरोधी दल इस हालात का लाभ उठा सकते हैं। देश के तीन बड़े राज्यों उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल में न सिर्फ लोकसभा सीटों की संख्या ज्यादा है बल्कि यहां मुस्लिम मतदाताओं की भी अधिकाधिक संख्या है। तीन तलाक पर भाजपा के स्टैंड के बाद तो आधी मुस्लिम आबादी भी भाजपा की ओर आकृष्ट हुई है। एकबारगी हिंदू समग्रता में मतदान करें या न करें, मुस्लिम समाज लगभग पूर्ण मतदान करता है। यही चिंता विपक्ष को इस तरह की चिंता व्यक्त करने को विवश कर रही है। इस बहाने भाजपा की सोच पर सवाल उठाकर वह मुस्लिम सहानुभूति की लहर पर सवार होना चाहता है। रमजान के दौरान कम मुस्लिम वोट पड़ने की आशंका जाहिर करने वाले राजनीतिक दल को 2018 के पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कैराना लोकसभा सीट और नूरपुर विधानसभा सीट पर हुए उप चुनाव पर भी गौर फरमाना होगा। उस समय भी रमजान चल रहे थे। कैराना में जब ईवीएम खराब हो गई थी तो मुस्लिम मतदाताओं ने बूथ पर ही रोजा इफ्तार किया था। इसलिए इस तरह की अफवाहें उड़ाने से बेहतर तो होगा कि चुनाव तिथि पर सवाल उठाने की बजाय राजनीतिक दल और धर्मगुरु इस पूरे मामले को मतदाताओं के विवेक पर छोड़ दें, यही लोकहित का तकाजा भी है।

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