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राष्ट्रगान के रचयिता की मूर्ति पर प्रहार

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मानवता के प्रखर चिंतक और राष्ट्रगान ‘जन-गण-मन‘ के रचयिता रविंद्रनाथ टैगोर की मूर्ति पर पथराव दुखदायी व चिंताजनक है। कोलकाता से सटे साल्टलेक में एक विद्यालय के सामने स्थापित गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर की प्रतिमा को क्षतिग्रस्त किए जाने की घटना हुई है। तीन युवकों ने सुबह पांच बजे के करीब मूर्ति को तोड़ने की कोशिश की। सुबह टहलने निकले स्थानीय लोगों ने इन युवकों को रोका तो दो भाग निकले, किंतु एक को दबोच लिया। उसका नाम सुजॉय मंडल बताया गया है। वह नशे का लती है। संभव है, उसे नशा करवाकर पथराव के लिए लगाया गया हो। असली दोषी बच निकले युवा भी हो सकते हैं। पथराव से गुरुदेव की प्रतिमा टूट गई है। यह घटना साहित्य और संस्कृति के मूल्यों के सरंक्षक पश्चिम बंगाल में घटी है। इससे पता चलता है कि अब विचार जहां सांस्कृतिक मूल्यों के विघटन का कारण बन रहा है, वहीं नशे के लतियों को भी इस पतन का अगुवा बनाने का काम तथाकथित रुढ़ीवादी बुद्धिजीवी करने लग गए हैं। बंगाल के लोगों को अपनी साहित्य और सांस्कृतिक विरासत पर जितना गर्व है, उतना ही बांग्ला भाषा पर भी है। भारत में साहित्य के लिए एकमात्र नोबेल पुरस्कार पाने वाले रविंद्रनाथ टैगोर हैं। उन्हें यह पुरस्कार दिसंबर 1913 में ‘गीतांजलि पर मिला था। मूल रूप से बांग्ला भाषा में लिखित यह किताब 157 गीतों का संग्रह है। गुरुदेव को जब यह सम्मान मिला था, तब इस सम्मान से विभूषित किए जाने वाले वे पहले एशियाई व्यक्ति थे। 7 मई 1861 में कोलकाता में जन्मे रविन्द्रनाथ बचपन से ही अद्भुत प्रतिभा के धनी थे। उन्होंने पहली कविता आठ साल की उम्र में लिखी थी और 1877 में जब वे 16 के हुए तो उनकी पहली लघुकथा प्रकाशित हुई थी। प्रारंभिक शिक्षा के लिए अंग्रेजी माध्यम के विद्यालय सेंट जेवियर में उनका दाखिला कराया गया, किंतु उन्हें यहां की शिक्षा रास नहीं आई और उन्होंने पाठशाला छोड़ दी। ब्रिटेन में कानूनी शिक्षा ग्रहण करने के लिए भी उन्हें भेजा गया लेकिन बिना कोई उपाधि (डिग्री) हासिल किए ही वे स्वदेश लौट आए। अंततः उनकी जो भी शिक्षा-दीक्षा हुई वह घर पर ही हुई। यहीं शिक्षा ग्रहण करते हुए उन्होंने मातृभाषा में लेखन शुरू किया और अनेक उपन्यास, कहानी, कविता, निबंध व नाटक लिखे। अनेक महत्वपूर्ण चित्र बनाए। यानी चित्रकला में निपुणता प्राप्त की। घर पर रहते हुए उन्होंने संगीत सीखा और पारंगत होने के बाद कुछ ऐसी मौलिक धुनें बनाईं, जिन्हें आज रवींद्र-संगीत के नाम से जाना जाता है। घर बैठे ही ‘गीतांजलि जैसी अनूठी रचना की, जिसे नोबेल सम्मान मिला। रविंद्रनाथ गीतांजलि के साथ-साथ स्वयं विश्व प्रसिद्ध व्यक्तित्व बन गए। बाद में उनकी गीतांजलि, उपन्यास ‘गोरा और अनेक कहानियां देश के विद्यालय और विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में अनुदित होकर शामिल हुए। अतएव जिस व्यक्ति ने शालेय शिक्षा भी विधिवत प्राप्त नहीं की, उस व्यक्ति को गुरु ही नहीं, बल्कि विश्व गुरु माना गया। कालांतर में इसी बहुमुखी प्रतिभा के धनी विश्व गुरु ने ‘शांति निकेतन जैसे शिक्षा संस्थान की स्थापना की। इस संस्थान में परीक्षाएं नहीं होती हैं। विश्व विख्यात कवि रविंद्रनाथ दुनिया के एकमात्र ऐसे रचनाकार हैं, जिनकी दो रचनाओं को दो देशों का राष्ट्रगान बनने का सम्मान मिला है। एक भारत का राष्ट्रगान ‘जन-गण-मन और दूसरा बांग्लादेश का राष्ट्रीय गान ‘अमार सोनार बांग्ला है। इसके अलावा श्रीलंका के राष्ट्रगान पर भी इन्हीं गीतों का प्रभाव है। टैगोर ने अंग्रेजी सत्ता के अमानवीय कार्यों का खुलकर विरोध किया था। जलियांवाला अमानुषिक अत्याचार के विरोध में उन्होंने अपनी ‘नाइटहुड की उपाधि फिरंगी हुकूमत को लौटा दी थी। मोहनदास करमचंद गांधी को महात्मा की उपाधि से अलंकृत करने का काम टैगोर ने ही किया था। गांधी और टैगोर के बारे में जवाहरलाल नेहरू ने लिखा है, ‘गांधी और टैगोर दोनों एक-दूसरे से पूरी तरह अलग हैं। फिर भी दोनों ठेठ भारतीय और भारत की महान हस्तियों में शुमार हैं। इतिहास की भारतीय ज्ञानधारा से गुरुदेव कितने प्रभावित व प्रेरित थे, इसे उनके निबंध ‘भारतवर्ष में इतिहास की धारा से समझा जा सकता है। इसीलिए वे रामायण और महाभारत को आर्य जाति का स्वरचित और स्वाभाविक इति-वृतांत मानते हैं। ‘भारतवर्ष में इतिहास की धारा निबंध में टैगोर लिखते हैं, ‘आर्य समाज में जितनी भी जनश्रुतियां खंडित रूप में चारों ओर बिखरी हुई थीं, उन्हें ही एकत्रित करके महाभारत के नाम से वेद व्यास ने संकलित किया। इसे गति देने के लिए एक निश्चित केंद्र आवश्यक था। उसी तरह एक धारावाहिक परिधि सूत्र की भी जरूरत थी। यह परिधि सूत्र ही इतिहास था। भारतीय सांस्कृतिक चेतना में नए प्राण फूंकने वाले गुरुदेव मानवता को राष्ट्रवाद से अधिक महत्व देते हैं। इसीलिए उन्होंने अपने एक पत्र में महात्मा गांधी को लिखा था ‘स्वंतत्रता संग्राम में देशप्रेम का शंखनाद किया जाना आवश्यक हो सकता है, परंतु स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद देशप्रेम का उग्र एवं हिंसक स्वरूप का उदय हो सकता है। युगद्रष्टा का यह संदेह अनुचित नहीं था क्योंकि आज उग्र राष्ट्रवाद ही दुनिया को धर्म आधारित कट्टरवाद की चुनौती के रूप में पेश आ रहा है। साफ है, राष्ट्रवाद के साथ-साथ गुरुदेव उस कालखंड में वामपंथ और दक्षिणपंथ के उभरते कट्टरवाद का भी अनुभव कर रहे थे। 17 अगस्त 1941 को दिवंगत हुए इस महान आत्मा की प्रतिमा पर पथराव किस दुर्भावना से प्रेरित होकर किया गया, यह तो जांच का विषय है लेकिन पश्चिम बंगाल में पराभव की चुनौती से जूझ रहे वामपंथी भी पथराव की पृष्ठभूमि में हो सकते हैं? बहरहाल निष्प्राण मूर्ति के हमलावर जो भी हों, इस हमले से भूमंडलीकरण के दौर में यह अवधारणा टूटती है कि वैश्विक संस्कृति का सृजन केवल प्रौद्योगिकी के नित्य नए-नए संस्करण लाने और विज्ञान की सार्वभौमिक शिक्षा के माध्यम से ही संभव है। सही मायनों में यह तर्क ही अविवेकी है। विज्ञान तभी सांस्कृतिक रूप से समावेशी हो सकता है, जब हम अपनी संस्कृति के परिवर्तित मूल्यों के साथ आगे बढ़ें। दुनिया में इस धारणा को बहिष्कृत करने के परिणाम स्वरूप ही आज मनुष्य आतिवाद की गिरफ्त में आता जा रहा है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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