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नये भारत के निर्माण की धुरी: नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति

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शिक्षा मानव विकास का मूल साधन है। इसके द्वारा व्यक्ति, समाज और राष्ट्र सभी का विकास होता है। शिक्षा मनुष्य को वह सब प्राप्त करने में सहायता करती है जिसके वह योग्य होता है। शिक्षा मनुष्य के भूत, वर्तमान तथा भविष्य तीनों से जुड़ी होती है। यह उसे उसके अतीत से परिचित कराती है। वर्तमान में जीने योग्य बनाती है और भविष्य के निर्माण की क्षमता प्रदान करती है। दार्शनिकों की दृष्टि से यह मनुष्य को अपने जीवन के उद्देश्यों को प्राप्त करने योग्य बनाती है। समाजशास्त्रियों की दृष्टि से यह मनुष्य का समाजीकरण करती है। सामाजिक नियन्त्रण रखती है और सामाजिक परिवर्तन करती है। राजनीतिशास्त्रियों की दृष्टि से यह मनुष्य को राज्य का श्रेष्ठ नागरिक बनाती है। मनोवैज्ञानिकों की दृष्टि से यह मनुष्य की जन्मजात शक्तियों का सर्वांगीण विकास करती है। वैज्ञानिक दृष्टि में शिक्षा मनुष्य की अन्तःशक्तियों का बाहृय जीवन से सामंजस्य स्थापित करती है और सृजनशील बनाती है। अर्थशास्त्रियों की दृष्टि से यह मनुष्य में व्यवसायिक कुशलता का विकास करती है और राष्ट्र के आर्थिक विकास में योगदान करती है। ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में शिक्षा को राष्ट्र निर्माण की आधारशिला माना जाता है। कोई भी राष्ट्र और समाज अपने गौरवपूर्ण इतिहास से बार-बार प्रेरणा लेता है और अपना कायाकल्प करता है। आगे बढ़ता है। इसी संदर्भ में हमें सामाजिक परिवर्तनों को देखना और समझना होगा। शिक्षा भारतवर्ष लिए हमेशा से अहम् रही है। भारत तक्षशिला और नालंदा जैसे शिक्षा केन्द्रों का स्थल रहा है। वर्तमान भारतीय समाज में शिक्षा व्यवस्था एवं शिक्षा प्रतिमान जिस प्रकार बड़ी तेजी से परिवर्तित हो रहे हैं, उन विभिन्न आयामों को गहनता से समझने की आवश्यकता है। बदलाव की इन परिस्थितियों, कारणों और कारकों को वैज्ञानिक दृष्टिकोण उपागमों, पद्धतियों और सिद्धान्तों की सहायता से अधिक सुगमता से समझा जा सकता है। देश में शिक्षा के बदलते परिदृश्य को समझना आज की महती आवश्यकता है। शिक्षा चाहे औपचारिक हो अथवा अनौपचारिक, चाहे वह प्राचीन आश्रमों में दी जाने वाली शिक्षा रही हो अथवा आज के आधुनिक स्कूलों, महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों में दी जाने वाली शिक्षा या फिर दूरदर्शन, कम्पयूटर और इंटरनेट के माध्यम से प्रसारित होने वाली शिक्षा हो। सभी अपने सामाजिक परिवेश से प्रभावित होती है। सामाजिक परिवर्तन के इन विभिन्न आयामों को समझना जरूरी है। नई शिक्षा नीति-2016 का प्रारुप इन्हीं सब बिन्दुओं को ध्यान में रखकर तैयार करने का प्रयास हुआ है। मौजूदा शैक्षिक परिदृश्य के विश्लेषणों से हमें शिक्षा के क्षेत्र में घटने वाली घटनाओं मात्र का ही पता नहीं चलेगा वरन् उसकी अन्य सामाजिक व्यवस्थाओं से होनेवाली अन्तःक्रियाओं का भी ज्ञान होगा। विगत में शिक्षा के संकुचित उद्देश्यों और संकीर्ण प्रणाली ने तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था को उद्वेलित किया है। समाज की आवश्यकतानुसार शिक्षा की संरचना में परिवर्तन होता है। उसके सामाजिक लक्ष्य एवं उद्देश्य भी समयानुकूल बदल जाते हैं। वर्तमान सरकार की नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2016 का प्रारुप इन्हीं आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। शिक्षा के सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक लक्ष्यों की पूर्ति हेतु हर दौर में शिक्षा का स्वरूप, साधन, अभिकरण, लक्ष्य आदि जरूर बदल जाते हैं। हमारे देश में कई प्रकार की शिक्षा प्रणालियां हैं। आंगनबाड़ी से लेकर वातानुकूलित विद्यालय/महाविद्यालय तक हमारे यहां मौजूद हैं। सरकारी गैर-सरकारी विद्यालयों से लेकर इसाई मिशनरियों द्वारा संचालित विद्यालय अथवा कुछ प्रतिष्ठित ट्रस्टों द्वारा स्थापित विद्यालय चल रहे हैं, जहां शिक्षा के स्तर में भंयकर विभेद है। इसका सामाजिक संतुलन पर विपरीत प्रभाव पड़ता रहा है। देश की वर्तमान सरकार शिक्षा को लेकर बहुत संजीदा है। कई दशक बाद नई शिक्षा नीति का प्रारुप मौजूदा सरकार ने तैयार की है, जिसे नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2016 के रुप में प्रस्तुत किया गया है। इस नई शिक्षा नीति के लिए जो इनपुट प्राप्त हुए हैं, उनके आधार पर जो प्रारुप तैयार हुआ उसके केन्द्र में समावेशी शिक्षा है। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति का लक्ष्य शिक्षा की गुणवत्ता और प्रासंगिकता को प्रोत्साहित करना है। शिक्षा व्यवस्था में विश्वसनीयता को बढ़ाना, प्राथमिक स्तर पर समान शिक्षा को सुनिश्चित करना, व्यवसायिक और कौशल शिक्षा को बढ़ावा देना, सामाजिक, लैंगिक और क्षेत्रीय भेदभाव को समाप्त कर बालिका और महिला सशक्तीकरण को बढ़ावा देना है। कमजोर वंचित वर्गों को प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा तक सुलभ और सुचारु बनाना, नई शिक्षा नीति में जो नया आयाम देश को विकास के पथ पर तेजी से अग्रसर करने में सहायक सिद्ध होगा वह है रोजगारपरक शिक्षा के लिए कौशल विकास के जरिये युवाओं में दक्षता को बढ़ावा देना। शिक्षा प्रणाली से बाहर रह जाने वाले युवाओं और वयस्कों को कौशल शिक्षा के जरिये देश की अर्थव्यवस्था का हिस्सा बनाना इसकी केन्द्रीय चिंता है। निष्कर्षतः नई राष्टृीय शिक्षा नीति-2016 एक विश्वसनीय और उच्च प्रदर्शनकारी शिक्षा प्रणाली को केन्द्र में रखकर आगे बढ़ रही है। देश और समाज को ऐसी शिक्षा नीति मिले जो समावेशी प्रवृत्ति की हो, गुणवत्तायुक्त हो, ज्ञानार्जन और शिक्षण के व्यापक और अनवरत अवसर जिसमें हो, क्षमताओं और दक्षताओं के साथ-साथ भावों और मूल्यों से आप्लावित हो, तेजी से बदलते समाज और वैश्वीकृत होते विश्व की ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था और नयी विश्व-व्यवस्था की जरूरतों को पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध हो। इन्हीं उद्देश्यों और लक्ष्यों के बीच राष्ट्रीय शिक्षा नीति नया रुप ले रही है। यही नये भारत के उद्भव और विकास की पूर्व -पीठिका बनेगी। राष्ट्र निर्माण की दिग्दर्शिका साबित होगी। अपार संभावनाओं को लिए राष्ट्रीय आकांक्षाओं को पूरा करने वाली नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2016, नये भारत के निर्माण की धुरी बनेगी।

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