Thursday ,18-Apr-19 ,
- 860211211      - padamparag@gmail.com
ताज़ा खबर

आरक्षण जरूरत है, सौगात नहीं

padamparag.in

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय द्वारा पिछड़े वर्ग के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण के आदेश पर प्रतिबंध लगाना प्रदेश की कमलनाथ सरकार को बड़ा झटका है। 14 से बढ़ाकर 27 प्रतिशत किए गए इस आरक्षण को अध्यादेश के जरिए महज पिछड़े वर्ग की जातियों के मतदाताओं को वोट की दृष्टि से लुभाने के लिए लाया गया था। हालांकि न्यायालय ने इसे पूरी तरह से खारिज नहीं किया है, लेकिन न्यायालय ने इस मुद्दे पर सुनवाई करते हुए जो कड़े तेवर दिखाए, उससे तय है कि आगे भी यह रास्ता खुलने वाला नहीं है। न्यायमूर्ति आरएस झा एवं संजय द्विवेदी की पीठ ने इस अंतरिम आदेश में साफ किया कि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के आरक्षण का कुल योग 50 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए। 14 प्रतिशत बढ़ाने के बाद आरक्षण का योगफल 63 फीसदी हो जाता है, जो कि संवैधानिक प्रावधान के सर्वथा विपरीत है। वर्तमान में अनुसूचित जाति के लिए 16, अनुसूचित जनजाति के लिए 20 और पिछड़ा वर्ग के लिए 13 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान सरकारी नौकरियों और शिक्षा में है। यह संविधान के अनुच्छेद 16 में वर्णित प्रावधान का पालन करता है। दरअसल, कमलनाथ सरकार ने आरक्षण का यह प्रावधान 8 मार्च 2019 को तब किया, जब पिछड़े वर्ग की किसी जाति ने आरक्षण की मांग नहीं उठाई थी। साफ है कि कांग्रेस लोकसभा चुनाव में इस सौगात को भुनाने की मंशा पाले हुई थी। लेकिन अदालत ने कांग्रेस के मंसूबों पर पानी फेर दिया। मध्यप्रदेश में यादव, धाकड़, गुर्जर, रावत, काछी और सोनी समाज सबसे बड़े पिछड़े जातीय समूह हैं। इनमें भी यादव 20 और सोनी जाति की आठ प्रतिशत आबादी है। शेष अन्य जातियां हैं। प्रदेश की सभी 29 लोकसभा सीटों पर 26 से लेकर 60 फीसदी तक की आबादी पिछड़े वर्ग की है। इसलिए मुख्यमंत्री कमलनाथ और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने आरक्षण के इस झुनझुने को लाकर वोट लुभाने की चाल चली थी, जो शिगूफा साबित हुई। कमलनाथ की इस सरकार में पिछड़ी जाति के मंत्रियों की संख्या सात है। इस वर्ग के 27 विधायक हैं और विधानसभा की महिला उपाध्यक्ष भी इसी कोटे से हैं। लेकिन लगता है, उनमें इस मुद्दे को भुनाने की सामर्थ्य कम है। इसलिए अध्यादेश जारी होने के बाद सभाओं में इन मंत्रियों ने आरक्षण को भुनाने की कोशिश भी नहीं की। लिहाजा इस आरक्षण से जो समाज लाभान्वित होने वाले थे, उन तक इस अहम् फैसले की जानकारी भी नहीं पहुंच पाई। आर्थिक रूप से सक्षम व दबंग जातियों को एक-एक करके आरक्षण के दायरे में लाने की कोशिशें देशभर में हो रही हैं। गौरतलब है कि जिन राज्यों ने भी पिछड़े वर्ग के कोटे में नए जाति समूहों को आरक्षण की सुविधा दी है, वह न्याय की कसौटी पर खरी नहीं उतरी है। बावजूद आरक्षण का कोटा बढ़ाए जाने के प्रावधान राज्य सरकारें करने में लगी हैं। नतीजतन आरक्षण के ज्यादातर नए उपाय यथास्थिति में बने हुए हैं। राजनीतिक दल अपनी तात्कालिक स्वार्थपूर्ति के लिए नई-नई जाति समूहों को आरक्षण देने का भरोसा देते हैं और समूह भरोसे में आ भी जाते हैं। आखिर में जाकर राजनेताओं की वादाखिलाफी जाति समुदायों को हिंसा के लिए उकसाने का काम करती है। लिहाजा नेताओं को तात्कालिक हित साधने की मानसिकता से मुक्त होने की जरूरत है। हालात ये हो गए हैं कि आरक्षण का अतिवाद अब हमारे राजनेताओं में वैचारिक पिछड़ापन बढ़ाने का काम कर रहा है। नतीजतन रोजगार व उत्पाद के नए अवसर पैदा करने की बजाय, हमारे नेता नई जातियां व उप-जातियां खोज कर उन्हें आरक्षण के लिए उकसाने का काम कर रहे हैं। यही वजह थी कि मायावती ने तो उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों तक को आरक्षण देने का शिगूफा छोड़ दिया था। आरक्षण के टोटके छोड़ने की बजाय अच्छा है कि सत्तारूढ़ नेता रोजगार के अवसर उपलब्ध नौकरियों में ही तलाशने की शुरूआत कर दें तो शायद बेरोजगारी दूर करने के कारगर परिणाम निकलने लगें। इस नजरिए से तत्काल नौकरी पेशाओं की उम्र घटाई जाए, सेवानिवृतों के सेवा विस्तार और प्रतिनियुक्तियों पर प्रतिबंध लगे। वैसे भी सरकारी दफ्तरों में कंप्यूटर व इंटरनेट तकनीक का प्रयोग जरूरी हो जाने से ज्यादातर उम्रदराज कर्मचारी अपनी योग्यता व कार्यक्षमता खो बैठे हैं। लिहाजा इस तकनीक से त्वरित प्रभाव और पारदर्शिता की जो उम्मीद थी, वह इसलिए कारगर नहीं हो पाई, क्योंकि तकनीक से जुड़ने की उम्रदराज कर्मचारियों में कोई जिज्ञासा ही नहीं है। साथ ही यह प्रावधान सख्ती से लागू करने की जरूरत है कि जिस किसी भी व्यक्ति को एक मर्तबा आरक्षण का लाभ मिल चुका है, उसकी संतान को इस सुविधा से वंचित किया जाए। ऐसा इसलिए कि एक बार आरक्षण का लाभ मिल जाने के बाद, जब परिवार आर्थिक रूप से संपन्न हो चुका है तो उसे खुली प्रतियोगिता की चुनौती मंजूर करनी चाहिए। साथ ही उसी की जाति के अन्य युवाओं को आरक्षण का लाभ मिल सके। इससे नागरिक समाज में सामाजिक समरसता का निर्माण होगा। नतीजतन आर्थिक बद्हाली के चलते जो शिक्षित बेरोजगार कुंठित हो रहे हैं, वे कुंठा मुक्त होंगे। जातीय समुदायों को यदि हम आरक्षण के बहाने संजीवनी देते रहे तो न तो जातीय चक्र टूटने वाला है और न ही किसी एक जातीय समुदाय का समग्र उत्थान अथवा कल्याण होने वाला है। स्वतंत्र भारत में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और कायस्थों को निर्विवाद रूप से सबसे ज्यादा सरकारी व निजी क्षेत्रों में नौकरी के अवसर मिले, लेकिन क्या इन जातियों से जुड़े समाजों की समग्र रूप में दरिद्रता दूर हुई? यही स्थिति अनुसूचित जाति व जनजातियों की है। दरअसल आरक्षण को सामाजिक असमानता खत्म करने का अस्त्र बनाने की जरूरत थी, लेकिन हमने इसे भ्रामक प्रगति का साध्य मान लिया है। नौकरी पाने के वही साधन सर्वग्राही व सर्वमंगलकारी होंगे,जो खुली प्रतियोगिता के भागीदार बनेंगे। अन्यथा आरक्षण के कोटे में आरक्षण को थोपने के उपाय तो जातिगत प्रतिद्वंद्विता को ही बढ़ाने का काम करेंगे। यह सही है कि एक समय आरक्षण की व्यवस्था हमारी सामाजिक जरूरत थी, लेकिन हमें इस परिप्रेक्ष्य में सोचना होगा कि आरक्षण बैसाखी है, पैर नहीं। याद रहे यदि विकलांगता ठीक होने लगती है तो चिकित्सक बैसाखी का उपयोग बंद करने की सलाह देते हैं और बैसाखी का उपयोगकर्ता भी यही चाहता है। लेकिन राजनीतिक महत्वाकांक्षा है कि आरक्षण की बैसाखी से मुक्ति नहीं चाहती। आरक्षण की मांग सक्षम तबका न उठाए, इसके लिए जरूरत है कि खेती-किसानी समेत उन सभी असंगठित क्षेत्रों की आर्थिक आय व सुरक्षा बढ़ाने की नीतियां अपनाई जाएं, जिनमें आर्थिक अनिश्चितता बनी रहती है।

Related Posts you may like

प्रमुख खबरें