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लोकतंत्र में सुविधा की सियासत

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राजनीति का यह दौर वैचारिक और सैद्धांतिक रुप से संक्रमण का है। राजनीति हर पल एक नयी परिभाषा गढ़ती दिखती है। वैचारिकता की जमीन सैद्धांतिक रुप से बंजर हो चली है। विचारों का कोई चरित्र है न चेहरा। सियासत में चहुंओर सिर्फ सत्ता के लिए संघर्ष है। राजनीतिक दलों में विचाराधारा सिद्धांत नहीं बन पा रही। राजनीति की बदलती परिभाषा में यह कहना मुश्किल है कि विचारों का सिद्धांत होता है या फिर अपनी सुविधा के अनुसार विचार और सिद्धांत गढ़े-मिटाये जाते हैं। सत्ता हो या प्रतिपक्ष उसके तथ्य और कथ्य में स्थायित्व नहीं दिखता है। राजनीति का मकसद सिर्फ सत्ता का संघर्ष हो चला है। तकनीकी रुप से राजनीति परिमार्जित तो हुई है, लेकिन भाषायी और वैचारिकता के धरातल पर परिष्कृत नहीं हो पायी है। कहना न होगा कि हमारा लोकतंत्र बेहद सुदृढ़ हुआ है। उसने बदलाव को आत्मसात किया है। स्वाधीनता के बाद के मिथकों को तोड़ा है। वह तकनीक के साथ सोच के धरातल पर मजबूत हुआ है। लेकिन अगर कुछ बदला नहीं है तो वह है सत्ता के लिए अधिनायकों का संघर्ष। सत्ता की नीति यह साबित करती है कि सिंहासन हासिल करने के लिए साम, दाम, दंड, भय और भेद कायम है और हमेशा रहेगा। इस संघर्ष में संगे-संबंधी, बंधु-बांधव, अपने-पराये कोई मायने नहीं रखते। रामायण काल में मां कैकेयी, महाभारत में द्रुत क्रीड़ा, मुगलकाल में अपनों का कत्लेआम जैसे अनगिनत उदाहरण हैं। इतिहास का पूरा कालखंड इसकी सम्यक गवाही देता है। राजनीति में सब कुछ जायज है। भारत लोकतांत्रिक व्यवस्था में दुनिया का सबसे संबृद्धशाली देश है। लेकिन हाल के दिनों में हमारी राजनीति में वैचारिक, सै़द्धांतिक एवं चारित्रिक गिरावट आयी है। राजनीतिक दलों और राजनेताओं की सारी रणनीति सत्ता के ईर्द-गिर्द सिमटती दिखती है। देश में चुनावी मौसम उफान पर है। राजनीतिक दलों में बिखराव और टूटन जारी है। राजनीति के केंद्र में सिर्फ सत्ता नहीं होनी चाहिए। उसमें नीति, नीयति, निर्माण के साथ विचारशीलता भी होनी चाहिए। आज के संदर्भ में शायद यह बात बेमानी साबित हो चली है। दलों में संगठन, विचार, सिद्धांत हाशिये पर हैं। मुद्दों की जमीन खाली है। नेता सिर्फ घात-प्रतिघात में लगे हैं। जहां से लोकतंत्र जिंदा है, वह अंतिम पड़ाव खाली है। चुनावी सभाओं में लच्छेदार जुमले गढ़े जा रहे हैं। भावनाओं को आगे कर तालियां लूटी जा रही हैं। राजनेता दलीय प्रतिबद्धता को खूंटी पर टांग टिकट न मिलने पर पाला बदलते दिख रहे हैं। कल जिस मंच से वह विरोधी दलों पर हमले बोल रहे थे, आज उसी पाले में खड़े अट्टाहास कर लोकतंत्र की गरिमा का उपहास उड़ा रहे हैं। भीड़ जिंदाबाद करती दिखती है। इसके लिए कौन गुनहगार है?हमारी संविधानिक प्रणाली, विधान या फिर हम यानी जनतंत्र। चुनावी मौसम में चिलचिलाती धूप में जनता अपने दल और नेताओं के लिए जिंदाबाद के नारे लगाती है। पार्टी कार्यकर्ता सियासी संघर्ष के दौरान अपने नेता के लिए पुलिस की लाठियां और कड़ाके की ठंड में दिल्ली के राजपथ पर वाटर कैनन का सामना करता है। बूथ पर एक-एक वोट लाता है। अपने अधिनायक के लिए वह सब कुछ करने को तैयार रहता है। वह झंडे और डंडे के साथ गलाफाड़ नारों के साथ सियासी विचाराधारा को कभी परास्त नहीं होने देता। चुनावों में वह दिन-रात संघर्ष करता है। उसकी वजह से राजनेता दिल्ली दरबार तक पहुंचता है। दुखद यह कि जिसके लिए वह सब करता है, वही राजनेता टिकट न मिलने पर सालों की अपनी दलीय निष्ठा को खूंटी पर टांग बेमेल विचारधारा और नीतियों को गले लगा दूसरे दल का दामन थाम लेता है। वह किसलिए पाला बदलता है। दूसरी राजनीतिक विचारधारा से जुड़ने का उसका मकसद क्या होता है। टिकट न मिलने से जिस विचाराधारा से वह जुड़ा होता है वह अचानक अपवित्र क्यों हो जाती है। इससे यह साबित होता है कि राजनीति में लोग जनसेवा नहीं, खुद का व्यापार करने आते हैं। राजनीति एक सौदा के साथ बाजार बन गई है। बदले दौर में विचार और नीतियां सिर्फ प्रस्तावना की लाइनभर हैं। भारतीय राजनीति में ग्लैमर हावी हो चला है। सेलिब्रेटी, अभिनेता, क्रिकेटर सभी की राजनीति पहली पसंद बन गयी है। राजनीतिक दल चुनाव जीतने के लिए हर तरह के हथकंडे अपना रहे हैं। नित नए जुमले गढ़े जा रहे हैं। राजनीति में भाषाई नैतिकता के पतन की होड़-सी दिखती है। कौन कितना गिर सकता है, यह कहना मुश्किल है। अब विकास नहीं सिर्फ नारों की बदौलत सत्ता का संघर्ष जारी है। आम आदमी जहां कल खड़ा था, वहीं आज भी है। गरीब अधिक गरीब जबकि अमीर और अमीर होता गया। जबकि सत्ता के इतिहास में गरीबी मिटाने का हर चुनावों में सपना बेचा गया। समता, समानता का मंत्रजाप किया जाता रहा, लेकिन जमीनी पड़ताल में आम आदमी पराजित और परास्त है। बढ़ती बेरोजगारी, किसानों की आत्महत्या, महिला सुरक्षा, गरीबी, आतंकवाद, नक्सलवाद, नस्लवाद, स्वास्थ्य, पर्यावरण जैसे तमाम मसलों पर कोई काम नहीं दिखता। लोकतंत्र में चुनाव सरकारों को चुनने का अहम माध्यम हैं। लेकिन चुनावों में आने वाले लोग कौन हैं? जनसेवा का आवरण ओढ़ने वाले राजनेता चुनाव के बाद प्रतिबद्धता क्यों कायम नहीं रख पाते हैं। चुनाव बाद चिलचिलाती धूप में खेतों में गेहूं काटने, गरीब के घर केले के पत्तल पर भोजन करने, आटो चलाते, सड़क चलते घायल व्यक्ति को खुद की गाड़ी में बिठाने के साथ पसीने पोंछने के साथ पांव पखारने का क्रम क्यों जारी नहीं रखते हैं। जनतंत्र बौद्धिक रुप से प्रौढ़ है। लोग सब जानते हैं कि यह चुनावी स्वांग हैं। सवाल उठता है कि जनसेवा का माध्यम सिर्फ राजनीति ही क्यों है? क्या बगैर सांसद-विधायक बने जनसेवा नहीं की जा सकती है? चुनावों में गेहूं की फसल काटने वाले राजनेता संसद में कभी किसानों की आत्महत्या पर मुंह क्यों नहीं खोलते? दलितों के घर भोजन करने वालों ने पांच साल तक क्या झुग्गी-झोपिड़यों कभी कदम रखा? राजनीति में क्या एक पटका और कुछ गुलस्ते के साथ मीडिया के चमकते कैमरों के सामने साल ओढ़ने पर विचारधारा और सिद्धांत का बदल जाते हैं। पूर्व की नीतियां और सिद्धांत बेमानी हो जाते हैं। अभिव्यक्ति के नाम पर सत्ता का नाटक लोकतंत्र को खोखला बना रहा है। सवाल उठता है कि चुनावी मौसम में ही दलबदल का बाजार क्यों सज जाता है। टिकट कटने पर ही विचारधाराएं अछूत क्यों हो जाती हैं। राजनीति जब जनसेवा है तो वह सौदा क्यों बन जाती है। क्या अभिनेता, अभिनेत्री, खिलाड़ी, संगीतकार, साहित्यकार, पत्रकार, प्रशासनिक अफसर रहते हुए देश की सेवा नहीं की जा सकती। जनसेवा का रास्ता क्या राजनीति की गलियों से गुजरता है। पार्टी सेवा में जिंदगी खपाने वाले संघर्षशील कार्यकर्ताओं को टिकट क्यों नहीं मिलता। गैर राजनीतिक क्षेत्र से आयातित लोगों को राजनेता बनाने धंधा कब बंद होगा। राजनीतिक दलों का अपने विकास कार्यों, नीतियों और सिद्धांतों भरोसा क्यों उठ जाता है। वह विभिन्न क्षेत्रों की चिर्चित हस्तियों को चुनावी मैदान में क्यों उतारते हैं। क्या उन्हें अपने विकास, नीतियों, सिद्धांतों पर खुद भरोसा नहीं है। यही वजह है कि चुनावी मौसम में हर रोज दल और दिल बदलते लोगों को देखा जा सकता है। यह लोकतांत्रित व्यवस्था में सबसे बड़ा संकट है। चुनाव आयोग को इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। इस तरह की सुविधा परस्त नीति से लोकतंत्र कमजोर हो रहा है। (लेखक पत्रकार हैं।)

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